{"_id":"6ab571d2709e9db8440cfff9","slug":"the-lungs-of-non-smokers-are-also-weakening-faridabad-news-c-26-1-fbd1023-80943-2026-09-25","type":"story","status":"publish","title_hn":"Faridabad News: धूम्रपान न करने वालों के भी फेफड़े हो रहे कमजोर","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Faridabad News: धूम्रपान न करने वालों के भी फेफड़े हो रहे कमजोर
विज्ञापन
प्रदूषण के कारण उम्र बढ़ने के साथ होने वाली सांस संबंधी परेशानियां अब युवाओं में भी दिखाई देने लगी
भारती दुबे
फरीदाबाद। धूम्रपान नहीं करने के बावजूद फेफड़ों पर प्रदूषण का असर पड़ रहा है। उम्र बढ़ने के साथ होने वाली सांस संबंधी परेशानियां अब युवाओं में भी दिखाई देने लगी हैं। लगातार खांसी, सीढ़ियां चढ़ने या थोड़ी दूर चलने पर सांस फूलना, सीने में जकड़न और सांस लेते समय सीटी जैसी आवाज की शिकायत लेकर कई युवा अस्पताल पहुंच रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, वायु प्रदूषण, धूल-धुआं, एलर्जी और बदलती जीवनशैली इसके प्रमुख कारणों में शामिल हैं।
जिले में औद्योगिक क्षेत्र, निर्माणाधीन क्षेत्रों और अधिक धूल वाले इलाकों में रहने वाले लोगों को प्रदूषण के कारण सांस संबंधी परेशानी का खतरा अधिक रहता है। लगातार प्रदूषित हवा में सांस लेने से फेफड़ों में सूजन और सांस की नलियों में संवेदनशीलता बढ़ सकती है। इसका असर अस्थमा और एलर्जी जैसी समस्याओं के रूप में सामने आ सकता है।
बीके अस्पताल में गंभीर मरीजों के लिए इंतजाम नाकाफी
बीके नागरिक अस्पताल में सांस संबंधी गंभीर मरीजों के उपचार के लिए संसाधनों की कमी भी सामने आती है। अस्पताल में छह बेड का आईसीयू है, लेकिन पर्याप्त विशेषज्ञ चिकित्सकों की व्यवस्था नहीं होने के कारण इसका अपेक्षित लाभ मरीजों को नहीं मिल पा रहा है। अस्पताल में फेफड़े की समस्या लेकर पहुंचने वाले मरीजों को रेफर कर दिया जाता है। गंभीर मरीजों के लिए वेंटिलेटर समेत अन्य जरूरी सुविधाएं उपलब्ध नहीं होने पर उन्हें उच्च चिकित्सा केंद्रों के लिए रेफर करना पड़ता है। सांस लेने में गंभीर परेशानी वाले मरीजों को जरूरत पड़ने पर दिल्ली भी रेफर किया जाता है। बीके अस्पताल में कार्यवाहक प्रधान चिकित्सा अधिकारी डॉ. विकास गोयल ने बताया कि विशेषज्ञों की नियुक्ति के लिए पत्र लिखा गया है, जल्द ही मरीजों को सुविधाएं दी जाएगी।
विज्ञापन
18 से 35 वर्ष की उम्र के युवाओं को भी सांस की समस्या
सेक्टर-86 स्थित निजी अस्पताल की वरिष्ठ श्वास रोग विशेषज्ञ डॉ. विद्या नायर के अनुसार पहले सांस फूलने और लंबे समय तक खांसी जैसी शिकायतें अधिकतर मध्य आयु और बुजुर्गों में देखने को मिलती थीं। अब 18 से 35 वर्ष की उम्र के युवाओं में भी ऐसी शिकायतें सामने आ रही हैं। अस्पताल की ओपीडी में प्रतिदिन करीब 50 से 60 युवा सांस संबंधी समस्या लेकर पहुंच रहे हैं। इनमें कई मरीजों में एलर्जी या अस्थमा की समस्या सामने आती है। डॉ. विद्या ने बताया कि 65 वर्षीय एक मरीज को कई महीनों से सांस फूलने की समस्या थी। वह पहले धूम्रपान करते थे। शुरुआत में उन्होंने सांस फूलने को सामान्य कमजोरी समझकर नजरअंदाज किया। बाद में जांच कराने पर सांस की नली में एलर्जी से जुड़ी समस्या सामने आई।
अस्थमा को टीबी समझकर चला दी दवा
50 वर्षीय महिला को लगातार खांसी और रात में सीने में जकड़न की शिकायत थी। शुरुआती जांच के आधार पर उन्हें टीबी की दवा दी गई, लेकिन परेशानी में सुधार नहीं हुआ। बाद में डॉ. विद्या ने दोबारा जांच कराई। इसमें अस्थमा के लक्षण सामने आए। नियमित उपचार और एलर्जी बढ़ाने वाले कारकों से बचाव की सलाह दी गई। डॉ. नायर के अनुसार युवाओं को सांस फूलने को सामान्य थकान समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। धूम्रपान और वेपिंग से दूरी रखने के साथ प्रदूषण व धूल वाले स्थानों पर मास्क का इस्तेमाल करना चाहिए। नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद और समय पर चिकित्सकीय जांच से सांस संबंधी समस्याओं की पहचान और नियंत्रण में मदद मिल सकती है।
विज्ञापन
भारती दुबे
फरीदाबाद। धूम्रपान नहीं करने के बावजूद फेफड़ों पर प्रदूषण का असर पड़ रहा है। उम्र बढ़ने के साथ होने वाली सांस संबंधी परेशानियां अब युवाओं में भी दिखाई देने लगी हैं। लगातार खांसी, सीढ़ियां चढ़ने या थोड़ी दूर चलने पर सांस फूलना, सीने में जकड़न और सांस लेते समय सीटी जैसी आवाज की शिकायत लेकर कई युवा अस्पताल पहुंच रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, वायु प्रदूषण, धूल-धुआं, एलर्जी और बदलती जीवनशैली इसके प्रमुख कारणों में शामिल हैं।
जिले में औद्योगिक क्षेत्र, निर्माणाधीन क्षेत्रों और अधिक धूल वाले इलाकों में रहने वाले लोगों को प्रदूषण के कारण सांस संबंधी परेशानी का खतरा अधिक रहता है। लगातार प्रदूषित हवा में सांस लेने से फेफड़ों में सूजन और सांस की नलियों में संवेदनशीलता बढ़ सकती है। इसका असर अस्थमा और एलर्जी जैसी समस्याओं के रूप में सामने आ सकता है।
विज्ञापन
बीके अस्पताल में गंभीर मरीजों के लिए इंतजाम नाकाफी
बीके नागरिक अस्पताल में सांस संबंधी गंभीर मरीजों के उपचार के लिए संसाधनों की कमी भी सामने आती है। अस्पताल में छह बेड का आईसीयू है, लेकिन पर्याप्त विशेषज्ञ चिकित्सकों की व्यवस्था नहीं होने के कारण इसका अपेक्षित लाभ मरीजों को नहीं मिल पा रहा है। अस्पताल में फेफड़े की समस्या लेकर पहुंचने वाले मरीजों को रेफर कर दिया जाता है। गंभीर मरीजों के लिए वेंटिलेटर समेत अन्य जरूरी सुविधाएं उपलब्ध नहीं होने पर उन्हें उच्च चिकित्सा केंद्रों के लिए रेफर करना पड़ता है। सांस लेने में गंभीर परेशानी वाले मरीजों को जरूरत पड़ने पर दिल्ली भी रेफर किया जाता है। बीके अस्पताल में कार्यवाहक प्रधान चिकित्सा अधिकारी डॉ. विकास गोयल ने बताया कि विशेषज्ञों की नियुक्ति के लिए पत्र लिखा गया है, जल्द ही मरीजों को सुविधाएं दी जाएगी।
विज्ञापन
18 से 35 वर्ष की उम्र के युवाओं को भी सांस की समस्या
सेक्टर-86 स्थित निजी अस्पताल की वरिष्ठ श्वास रोग विशेषज्ञ डॉ. विद्या नायर के अनुसार पहले सांस फूलने और लंबे समय तक खांसी जैसी शिकायतें अधिकतर मध्य आयु और बुजुर्गों में देखने को मिलती थीं। अब 18 से 35 वर्ष की उम्र के युवाओं में भी ऐसी शिकायतें सामने आ रही हैं। अस्पताल की ओपीडी में प्रतिदिन करीब 50 से 60 युवा सांस संबंधी समस्या लेकर पहुंच रहे हैं। इनमें कई मरीजों में एलर्जी या अस्थमा की समस्या सामने आती है। डॉ. विद्या ने बताया कि 65 वर्षीय एक मरीज को कई महीनों से सांस फूलने की समस्या थी। वह पहले धूम्रपान करते थे। शुरुआत में उन्होंने सांस फूलने को सामान्य कमजोरी समझकर नजरअंदाज किया। बाद में जांच कराने पर सांस की नली में एलर्जी से जुड़ी समस्या सामने आई।
अस्थमा को टीबी समझकर चला दी दवा
50 वर्षीय महिला को लगातार खांसी और रात में सीने में जकड़न की शिकायत थी। शुरुआती जांच के आधार पर उन्हें टीबी की दवा दी गई, लेकिन परेशानी में सुधार नहीं हुआ। बाद में डॉ. विद्या ने दोबारा जांच कराई। इसमें अस्थमा के लक्षण सामने आए। नियमित उपचार और एलर्जी बढ़ाने वाले कारकों से बचाव की सलाह दी गई। डॉ. नायर के अनुसार युवाओं को सांस फूलने को सामान्य थकान समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। धूम्रपान और वेपिंग से दूरी रखने के साथ प्रदूषण व धूल वाले स्थानों पर मास्क का इस्तेमाल करना चाहिए। नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद और समय पर चिकित्सकीय जांच से सांस संबंधी समस्याओं की पहचान और नियंत्रण में मदद मिल सकती है।