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Faridabad News: आवासीय मकान को तोड़ने की कार्रवाई पर जिला अदालत ने लगाई रोक
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निचली अदालत का आदेश रद्द, सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का दिया हवाला
अमर उजाला ब्यूरो
फरीदाबाद। नगर निगम फरीदाबाद की ओर से एक आवासीय मकान को तोड़ने की कार्रवाई पर जिला अदालत ने रोक लगा दी है। अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश ज्योति लांबा की अदालत ने निचली अदालत के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें मकान मालिक को अंतरिम राहत देने से इनकार किया गया था। अदालत ने साफ कहा कि सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का पालन किए बिना किसी भी रिहायशी मकान को नहीं गिराया जा सकता।
भारत कॉलोनी निवासी श्रीचंद ने अपना मकान बनवाया था। नगर निगम का कहना है कि मकान का निर्माण बिना स्वीकृत नक्शे के किया गया है, जिसमें बेसमेंट सहित दो मंजिल बनाई गई हैं। इसी आधार पर निगम ने मकान तोड़ने का नोटिस जारी किया था। इसके खिलाफ श्री चंद ने निचली अदालत में याचिका दी थी लेकिन निचली अदालत ने 3 सितंबर 2025 को उन्हें राहत देने से मना कर दिया था। इसके बाद उन्होंने जिला न्यायालय में अपील दायर की।
जिला अदालत में नगर निगम की ओर से दलील दी गई कि मकान पूरी तरह अवैध है और इसे कंपाउंड करने का कोई प्रावधान नहीं है। निगम ने यह भी कहा कि मकान मालिक को नोटिस देकर सुनवाई का पूरा मौका दिया गया लेकिन वह कोई पास नक्शा या स्वीकृत योजना पेश नहीं कर सके।
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वहीं याचिकाकर्ता श्रीचंद की ओर से कहा गया कि पहला नोटिस किसी और व्यक्ति के नाम जारी किया गया था और निगम ने उनके साथ भेदभाव किया है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि उनके मकान के पास एक अस्पताल व एक मकान बिना स्वीकृत नक्शे के बने हुए हैं लेकिन कार्रवाई केवल उनके मकान पर ही की जा रही है।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला दिया। अदालत ने कहा कि किसी भी तोड़-फोड़ से पहले प्रभावित व्यक्ति को स्पष्ट नोटिस देना, पर्याप्त समय देना, डिजिटल पोर्टल पर जानकारी डालना और वैकल्पिक उपायों पर विचार करना जरूरी है। अदालत के मुताबिक नगर निगम यह साबित नहीं कर सका कि इन सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पूरी तरह पालन किया गया है।
अदालत ने यह भी माना कि मकान किसी सरकारी जमीन, सड़क, फुटपाथ या जल स्रोत पर नहीं बना है और मकान मालिक अपने परिवार के साथ वहीं रह रहा है। ऐसे में बिना किसी वैकल्पिक समाधान पर विचार किए पूरे मकान को गिराना अंतिम विकल्प नहीं हो सकता।
सभी परिस्थितियों को देखते हुए जिला अदालत ने निचली अदालत का आदेश रद्द कर दिया और मामले के अंतिम फैसले तक मकान तोड़ने की कार्रवाई पर रोक लगा दी। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह आदेश मामले के अंतिम गुण-दोष पर उसकी राय नहीं माना जाएगा।
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अमर उजाला ब्यूरो
फरीदाबाद। नगर निगम फरीदाबाद की ओर से एक आवासीय मकान को तोड़ने की कार्रवाई पर जिला अदालत ने रोक लगा दी है। अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश ज्योति लांबा की अदालत ने निचली अदालत के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें मकान मालिक को अंतरिम राहत देने से इनकार किया गया था। अदालत ने साफ कहा कि सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का पालन किए बिना किसी भी रिहायशी मकान को नहीं गिराया जा सकता।
भारत कॉलोनी निवासी श्रीचंद ने अपना मकान बनवाया था। नगर निगम का कहना है कि मकान का निर्माण बिना स्वीकृत नक्शे के किया गया है, जिसमें बेसमेंट सहित दो मंजिल बनाई गई हैं। इसी आधार पर निगम ने मकान तोड़ने का नोटिस जारी किया था। इसके खिलाफ श्री चंद ने निचली अदालत में याचिका दी थी लेकिन निचली अदालत ने 3 सितंबर 2025 को उन्हें राहत देने से मना कर दिया था। इसके बाद उन्होंने जिला न्यायालय में अपील दायर की।
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जिला अदालत में नगर निगम की ओर से दलील दी गई कि मकान पूरी तरह अवैध है और इसे कंपाउंड करने का कोई प्रावधान नहीं है। निगम ने यह भी कहा कि मकान मालिक को नोटिस देकर सुनवाई का पूरा मौका दिया गया लेकिन वह कोई पास नक्शा या स्वीकृत योजना पेश नहीं कर सके।
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वहीं याचिकाकर्ता श्रीचंद की ओर से कहा गया कि पहला नोटिस किसी और व्यक्ति के नाम जारी किया गया था और निगम ने उनके साथ भेदभाव किया है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि उनके मकान के पास एक अस्पताल व एक मकान बिना स्वीकृत नक्शे के बने हुए हैं लेकिन कार्रवाई केवल उनके मकान पर ही की जा रही है।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला दिया। अदालत ने कहा कि किसी भी तोड़-फोड़ से पहले प्रभावित व्यक्ति को स्पष्ट नोटिस देना, पर्याप्त समय देना, डिजिटल पोर्टल पर जानकारी डालना और वैकल्पिक उपायों पर विचार करना जरूरी है। अदालत के मुताबिक नगर निगम यह साबित नहीं कर सका कि इन सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पूरी तरह पालन किया गया है।
अदालत ने यह भी माना कि मकान किसी सरकारी जमीन, सड़क, फुटपाथ या जल स्रोत पर नहीं बना है और मकान मालिक अपने परिवार के साथ वहीं रह रहा है। ऐसे में बिना किसी वैकल्पिक समाधान पर विचार किए पूरे मकान को गिराना अंतिम विकल्प नहीं हो सकता।
सभी परिस्थितियों को देखते हुए जिला अदालत ने निचली अदालत का आदेश रद्द कर दिया और मामले के अंतिम फैसले तक मकान तोड़ने की कार्रवाई पर रोक लगा दी। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह आदेश मामले के अंतिम गुण-दोष पर उसकी राय नहीं माना जाएगा।