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पेड़ों को बचाना अब जीवन का हिस्सा बन गया

Mon, 09 Aug 2021 06:54 PM IST
Noida Bureau नोएडा ब्यूरो
Updated Mon, 09 Aug 2021 06:54 PM IST
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Saving trees is now a part of life
फरीदाबाद। पेड़ों की सही कीमत का अंदाजा कोरोना काल से ज्यादा कभी भी नहीं लगाया जा सकता। देश में जब संकट आया तो लोगों को पेड़ों की इसकी अहमियत का पता लगा, लेकिन कुछ युवा ऐसे भी हैं जो इसकी जरूरत को काफी पहले ही समझ गए। वे लोगों को भी लगातार जागरूक करने में जुट गए। हम बात कर रहे हैं शहर के ऐसे लोगों की जिन्होंने पर्यावरण और पेड़ों को बचाना अपने जीवन का हिस्सा बना लिया।
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जसवंत पंवार : जन्मदिन पर देते हैं एक पेड़
बल्लभगढ़ निवासी जसवंत पंवार ने बताया कि उन्होंने पिछले तीन वर्षों से ‘सांसें’ मुहिम चला रखी है। इसके तहत वे अपने जानकारों के जन्मदिन पर उन्हें उपहार के रूप में एक पौधा देते हैं। इसे वे अपने सामने ही जमीन में लगवाते हैं और उसे संभालने की शपथ भी दिलवाते हैं। उन्होंने बताया कि वह पीपल, बरगद, गूलर या नीम जैसे पेड़ों को ही चुनते हैं। इन पेड़ों से औषधीय गुणों के साथ-साथ ऑक्सीजन व पशुओं के लिए छांया भी मिलती है। फ्लैट आदि में रहने वालों के लिए अब वे इनडोर प्लांट्स भी गिफ्ट करने लगे हैं। उनका कहना है कि पेड़ बचेंगे तो सांसें चलेंगी।
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जितेंद्र : अरावली में जंगल बनाने के लिए बना डाली संस्था
सेव अरावली संस्था के फाउंडर सदस्य जितेंद्र भड़ाना ने बताया कि उन्होंने करीब दस साल पहले सेव अरावली नाम की संस्था बनाई थी। इसके तहत वे अरावली व खाली मैदानों में जंगल व वनीकरण करने का काम करते हैं। उन्होंने पिछले कई सालों में अरावली में बड़े स्तर पर जंगल विकसित किये हैं। हाल ही में सरकार ने उन्हें पाली गांव के पास कई एकड़ जमीन में वन लगाने का काम दिया है। फिलहाल उनके पास 200 से ज्यादा सदस्य हैं। उनकी संस्था में खुद के माली, ट्रैक्टर व अन्य संसाधन हैं जो पौधों व पेड़ों को बचाने में सहायक हैं।
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सुनील हरसाना : गांव में बनाया बसेरा
गांव मांगर निवासी सुनील हरसाना ने बताया कि वह करीब दस साल से वन्य जीवों, पर्यावरण व पेड़ पौधों पर शोध का काम कर रहे हैं। अपने काम में वे इतने व्यस्त हो गए हैं कि गांव में ही बसेरा बना लिया है। मांगर बनी में मिलने वाली दुर्लभ प्रजाति की औषधियां व जीव जंतुओं को बचाने के लिए उन्होंने काफी प्रयास किया है। अरावली में जिन जगहों पर वन्य जीव ज्यादा हैं। वहां पानी आदि की व्यवस्था के लिए उन्होंने पैदल ही जाकर संसाधन तैयार किये हैं।
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