{"_id":"5f21af798ebc3e9fa739988d","slug":"parents-facing-problem-regarding-children-s-admission-faridabad-news-noi5265713113","type":"story","status":"publish","title_hn":"ट्यूशन फीस देना भी हुआ दूभर, सरकारी स्कूल में दाखिले को टीसी नहीं","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
ट्यूशन फीस देना भी हुआ दूभर, सरकारी स्कूल में दाखिले को टीसी नहीं
विज्ञापन
फरीदाबाद (मूर्ति दलाल)। तीन दिन पूर्व हाईकोर्ट ने आदेश जारी कर सभी तरह की मद में निजी स्कूलों को फीस वसूली की इजाजत दे दी है। कोर्ट के इस फैसले से अभिभावक काफी परेशान हैं। कई विद्यार्थी भी परिवार के सहयोग के लिए निजी स्कूलों को छोड़ सरकारी में दाखिला लेने का मन बना चुके हैं। इसमें भी परेशानियां हैं। कुछ को निजी स्कूल टीसी नहीं दे रहे तो कुछ की बकाया फीस के कारण दाखिले नहीं हो पा रहे हैं।
जिले में ऐसे विद्यार्थियों का आधिकारिक आंकड़ा करीब छह हजार है, जो निजी छोड़ सरकारी स्कूल का रुख कर चुके हैं। इसमें से दो हजार ने स्कूल बदल लिया है, करीब चार हजार को निजी स्कूल टीसी नहीं दे रहे और अस्थाई (प्रॉविजिनल) दाखिले से पंजीकरण स्थायी नहीं हुआ है। अनौपचारिक स्तर पर यह आंकड़ा और बड़ा भी हो सकता है।
नंगला एंक्लेव पार्ट-2 में निवासी मीना ने बताया कि उनका बेटा 10वीं के बोर्ड में 90 फीसदी अंक लेकर पास हुआ है। पति निजी कंपनी में नौकरी करते हैं। उन्होंने हाल ही में बेटे का दाखिला सेक्टर-55 स्थित सरकारी स्कूल में कराया है, हालांकि यह दाखिला अस्थाई है। क्योंकि निजी स्कूल टीसी देने से इंकार कर रहा है। मासिक रूप से 3200 रुपये स्कूल फीस देने की क्षमता परिवार की रही नहीं। हालांकि बेटे को स्कूल में बनाए रखने के लिए निजी स्कूल 2500 रुपये मासिक फीस में राजी है, मगर मीना परिवार की स्थिति को इस फीस भुगतान के काबिल नहीं मानती। वह सरकारी स्कूल में मासिक सौ रुपये देकर बच्चे को आगे पढ़ाना चाहती हैं।
विज्ञापन
संजय कॉलोनी निवासी विशाल बताते हैं कि हाल ही में उन्होंने निजी स्कूल से दसवीं पास की है। परचून की दुकान से परिवार का गुजारा व फीस अब दुर्लभ लग रहे हैं। घर में एक स्मार्ट फोन है। छोटी बहन 8वीं की पढ़ाई उसी से कर रही है। स्कूल व्हाट्सएप पीडीएफ और रिकॉर्डिड वीडियो फोन पर शेयर करते हैं। इसकी अच्छी फीस वसूल रहे हैं। ऐसे में विशाल ने सरकारी स्कूल में ही पढ़कर पिता का सहयोग करने का मन बनाया है। विशाल का मानना है कि सोशल मीडिया पढ़ाई पर ट्यूशन फीस पर्याप्त है। निजी स्कूलों में यह फीस भी परिवारों के लिए महंगी ही है।
डबुआ कॉलोनी निवासी इरफान के परिवार में आठ सदस्य हैं। पिता निजी गाड़ियों में माल लोड करते हैं। उनके दो भाई बहन निजी स्कूल में 9वीं व 12वीं कक्षा में पढ़ते हैं। दोनों की फीस मासिक ढाई हजार रुपये है। लॉकडाउन के कारण पिता की कमाई नाम मात्र है। बचत से परिवार चल रहा है। अब हाईकोर्ट के फैसले के बाद छोटे भाई बहनों की पढ़ाई के लिए फीस का दबाव उन्हें व पिता को परेशान कर रहा है। फिलहाल पढ़ाई जारी रखने के लिए क्या करें, इसका कोई विकल्प उन्होंने नहीं सोचा है।
विज्ञापन
जिले में ऐसे विद्यार्थियों का आधिकारिक आंकड़ा करीब छह हजार है, जो निजी छोड़ सरकारी स्कूल का रुख कर चुके हैं। इसमें से दो हजार ने स्कूल बदल लिया है, करीब चार हजार को निजी स्कूल टीसी नहीं दे रहे और अस्थाई (प्रॉविजिनल) दाखिले से पंजीकरण स्थायी नहीं हुआ है। अनौपचारिक स्तर पर यह आंकड़ा और बड़ा भी हो सकता है।
विज्ञापन
नंगला एंक्लेव पार्ट-2 में निवासी मीना ने बताया कि उनका बेटा 10वीं के बोर्ड में 90 फीसदी अंक लेकर पास हुआ है। पति निजी कंपनी में नौकरी करते हैं। उन्होंने हाल ही में बेटे का दाखिला सेक्टर-55 स्थित सरकारी स्कूल में कराया है, हालांकि यह दाखिला अस्थाई है। क्योंकि निजी स्कूल टीसी देने से इंकार कर रहा है। मासिक रूप से 3200 रुपये स्कूल फीस देने की क्षमता परिवार की रही नहीं। हालांकि बेटे को स्कूल में बनाए रखने के लिए निजी स्कूल 2500 रुपये मासिक फीस में राजी है, मगर मीना परिवार की स्थिति को इस फीस भुगतान के काबिल नहीं मानती। वह सरकारी स्कूल में मासिक सौ रुपये देकर बच्चे को आगे पढ़ाना चाहती हैं।
विज्ञापन
संजय कॉलोनी निवासी विशाल बताते हैं कि हाल ही में उन्होंने निजी स्कूल से दसवीं पास की है। परचून की दुकान से परिवार का गुजारा व फीस अब दुर्लभ लग रहे हैं। घर में एक स्मार्ट फोन है। छोटी बहन 8वीं की पढ़ाई उसी से कर रही है। स्कूल व्हाट्सएप पीडीएफ और रिकॉर्डिड वीडियो फोन पर शेयर करते हैं। इसकी अच्छी फीस वसूल रहे हैं। ऐसे में विशाल ने सरकारी स्कूल में ही पढ़कर पिता का सहयोग करने का मन बनाया है। विशाल का मानना है कि सोशल मीडिया पढ़ाई पर ट्यूशन फीस पर्याप्त है। निजी स्कूलों में यह फीस भी परिवारों के लिए महंगी ही है।
डबुआ कॉलोनी निवासी इरफान के परिवार में आठ सदस्य हैं। पिता निजी गाड़ियों में माल लोड करते हैं। उनके दो भाई बहन निजी स्कूल में 9वीं व 12वीं कक्षा में पढ़ते हैं। दोनों की फीस मासिक ढाई हजार रुपये है। लॉकडाउन के कारण पिता की कमाई नाम मात्र है। बचत से परिवार चल रहा है। अब हाईकोर्ट के फैसले के बाद छोटे भाई बहनों की पढ़ाई के लिए फीस का दबाव उन्हें व पिता को परेशान कर रहा है। फिलहाल पढ़ाई जारी रखने के लिए क्या करें, इसका कोई विकल्प उन्होंने नहीं सोचा है।