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200 करोड़ रुपये नहीं वसूल पा रहा है नगर निगम
भोला पांडेय/अमर उजाला, फरीदाबाद
Updated Sun, 29 May 2016 01:04 AM IST
सार
- निगम ने बेची थी जमीन, अधिकारी दे रहे प्रापर्टी में मंदी का हवाला
- इंजीनियरिंग विभाग के अफसरों की लापरवाही से नहीं हो पा रही वसूली, कर्ज में डूब रहा नगर निगम
- निगम ने बेचा था आवासीय, व्यवसायिक व औद्योगिक प्लाट
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- फोटो : getty
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विस्तार
केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय ने बेशक इसे स्मार्ट सिटी की सूची में शामिल कर लिया हो लेकिन विकास के लिए 1600 करोड़ रुपये जुटा पाना नगर निगम के लिए किसी चुनौती से कम नहीं होगा। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अपनी जमीन बेचकर भी वह 200 करोड़ से अधिक रुपये की वसूली नहीं कर पा रहा है।
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अपनी लापरवाही छिपाने के लिए निगम अधिकारी प्रापर्टी में मंदी होने की दुहाई दे रहे हैं। निगम खर्च के आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो इतने बकाए से निगम का आठ महीने का खर्च चल सकता है।
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निगम सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार वर्ष 2009 से वर्ष 2013 के बीच नगर निगम ने आवासीय, व्यवसायिक, औद्योगिक और ग्रुप हाउसिंग स्कीमें लाई थी। अरावली विहार, विकास नगर और सूर्य नगर में 90 आवासीय प्लाट बेचे गए। जबकि सेक्टर-41 में छह और सेक्टर-85 नहरपार में तीन ग्रुप हाउसिंग स्कीम लाकर जमीन की बिक्री की थी।
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इसके अलावा 160 व्यवसायिक साइट और 2 औद्योगिक साइट भी बेची थी। इनकी कुल कीमत 547.22 करोड़ रुपये थी। निगम अब तक 345.89 करोड़ रुपये ही वसूल कर पाया है। इनमें अकेले ग्रुप सोसाइटी के लिए बिल्डरों से 198 करोड़ रुपये से अधिक बकाया है।
अधिकारी प्रापर्टी में मंदी का दे रहे हवाला:
स्थानीय निकाय एवं पंचायती राज संस्थानों की विधानसभा कमेटी द्वारा पूछे गए सवाल कि निगम अपनी लैंड सेल की वसूली क्यों नहीं कर पा रहा है, के जवाब में निगम अफसरों ने जो जवाब दिया है वह चौकाने वाला है। अफसरों का कहना है कि रियल स्टेट सेक्टर में वर्तमान में मंदी व आर्थिक तंगी है। इस वजह से वसूली नहीं हो पा रही है।
लापरवाही को छुपा रहे हैं निगम अधिकारी:
करोड़ों के बकाए की वसूली न होने के असली कारणों को निगम अधिकारी छुपाने में लगे हैं। हकीकत यह है कि जब निगम ने ग्रुप हाउसिंग स्कीम के लिए ऑक्सन किया था तो उन्होंन बिल्डरों से एक साल के अंदर वहां बिजली, पानी, सड़क और सीवेज जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने का दावा किया था।
लेकिन आज तक वहां कोई मूलभूत सुविधाएं नहीं मिल पाई हैं। नाम न छापने की शर्त पर एक ग्रुप हाउसिंग के बिल्डर ने बताया कि निगम बिल्डरों से 200 करोड़ रुपये तो पहले जमा कर लिया लेकिन आज तक एक करोड़ का काम ग्रुप हाउसिंग सोसाइटियों में नहीं खर्च किया। ऐसे में खरीदार कैसे आएंगे।
बकाए से चल सक ता है आठ महीने का खर्च:
वर्तमान में नगर निगम का जितना बकाया है उससे निगम आठ महीने तक अपने खर्च आसानी से पूरा कर सकता है। निगम के हर महीने को वेतन, बिजली समेत अन्य पर करीब 24 से 25 करोड़ रुपये खर्च आता है।
से में 200 करोड़ से अधिक बकाया आने पर आठ महीने तक निगम को आसानी से चलाया जा सकता है। अफसरों की इस तरह की लापरवाही के कारण ही निगम लगातार कर्ज में डूबता जा रहा है। इस मामले में निगम का कोई अधिकारी बोलने को तैयार नहीं है।