नीमका जेल : पांच साल में 600 से ज्यादा बंदी हुए शिक्षित
- अनपढ़ बंदियों को भी बनाया गया साक्षर
- वोकेशनल ट्रेनिंग भी ले रहे
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अभी मत पूछ हमारी मंजिल क्या है, अभी तो चलने का इरादा किया है, न हारे हैं न हारेंगे कभी, खुद से वादा किया है। यह लाइनें शिक्षा के माध्यम से खुद में बदलाव की मुहिम से जुड़े बंदियों पर सटीक बैठती है। एक बार कोई थाना या जेल चला जाता है तो समाज उसको हीन दृष्टि से देखता है।
लेकिन फरीदाबाद की नीमका स्थित जेल के 600 से ज्यादा बंदी नजीर पेश कर रहे हैं। जेल में रहकर इनमें से किसी ने स्कूली शिक्षा हासिल की तो कोई ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट बन गया। जेल में बंदियों को स्वावलंबी बनाने व शिक्षित करने के लिए सरकार की तरफ से कई योजनाएं चलाई जा रही हैं।
जेल से निकलने के बाद समाज में नई पहचान हासिल करने के लिए बंदियों को वोकेशनल ट्रेनिंग भी दी जा रही है। जेल में सजा काट रहे कई निरक्षर बंदियों ने साक्षर बनने की ठानी है। जेल में बंदियों को नई राह दिखाने का काम जेल प्रशासन बखूबी कर रहा है।
बाकायदा, बंदियों को शिक्षा के प्रति जागरूक किया जा रहा है। 2011 से इस काम को किया जा रहा है। जानकर हैरानी होगी कि दिसंबर 2015 तक यानी पांच साल में 785 बंदियों ने ओपन एजुकेशन के माध्यम से 10वीं और 12वीं की परीक्षा दी। जिनमें 495 बंदियों ने सफलता हासिल की। इनमें 10 महिलाएं भी शामिल हैं। ग्रेजुएशन करने के लिए 331 ने परीक्षा दी थी, आज 131 बंदी ग्रेजुएट हो चुके हैं। दो बंदियों ने तो मास्टर डिग्री भी हासिल कर ली है।
छह घंटे होती है पढ़ाई
जेल में पढ़ाई कर रहे बंदियों के लिए सुबह 8:30 बजे स्कूल खुलता है और 12:30 बजे तक यानि चार घंटे पढ़ाई होती है। उसके बाद शाम को दो घंटे के लिए स्कूल खोला जाता है। जेल में बंद पढ़े लिखे बंदी भी साक्षरता अभियान को आगे बढ़ाने में मदद करते हैं।
कराए जा रहे वोकेशनल कोर्स
मोटर वाइंडिंग, बैग मेकिंग, फिटर इंजन, टू-व्हीलर रिपेयर, प्लंबिंग, सिलाई मशीन, कंप्यूटर, पेंटिंग, डांङ्क्षसग, ब्यूटीशियन, धागाडोर, सिलाई कढ़ाई और टेलरिंग।
जेल में ई-लाइब्रेरी की सुविधा
पढ़ाई में संसाधनों की कमी बाधा न बने इसको ध्यान में रख नीमका जेल में साधारण लाइबे्रेरी और ई-लाइब्रेरी जैसी सुविधा दी गई है। रात में भी बंदी समय निकालकर पढ़ाई कर रहे हैं। इसके अलावा बैरक में किताबें ले जाने की सुविधा दी गई है।
जेल में बंदियों को मिला रोजगार
जेल में पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) के तहत फैक्ट्री लगाई गई है। जिसमें काम करने वालें बंदियों को रोजाना मेहनताना दिया जाता है। जेल की फैक्ट्री में तीन कंपनियों से करार है। उन कंपनियों द्वारा कच्चा माल दिया जाता है। जिससे कैदी कारपेंटर, पैकिंग, खराद और टेलरिंग का काम करते हैं और कंपनियों के आर्डर पूरा करते हैं।
जेल में बंदियों को शिक्षित व स्वावलंबी बनाने के लिए विभिन्न कोर्स कराए जा रहे हैं। ताकि जेल से छूटने के बाद दोबारा जुर्म की दुनिया में कदम न रखें। जेल के छूटने के बाद रोजगार स्थापित करने में आर्थिक तंगी बाधा न बने, इसके लिए बैंक से लोन भी दिलाया जा रहा है। -दीपक शर्मा, नीमका जेल अधीक्षक