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कारगिल शहीद: शहीद वीरेंद्र की बात करते ही परिजनों की छाती गर्व से हो जाती है चौड़ी

Wed, 22 Jul 2020 10:48 PM IST
Noida Bureau नोएडा ब्यूरो
Updated Wed, 22 Jul 2020 10:48 PM IST
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शहीद वीरेंद्र की बात करते ही परिजनों की छाती गर्व से हो जाती है चौड़ी
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फरीदाबाद। कारगिल युद्ध में मश्कोह घाटी (कश्मीर) में पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़ने के दौरान शहीद हुए गांव मोहना के फौजी वीरेंद्र सिंह की शहादत की बात करते ही उनके परिजनों की आंखें उन्हें याद करते हुए नम तो छाती गर्व से चौड़ी हो जाती है। 21 साल की उम्र में देश के लिए बलिदान देने वाले वीरेंद्र सिंह क्षेत्र के युवाओं के लिए हमेशा प्रेरणा स्रोत रहेंगे। इन जैसे बहादुरों की बदौलत ही 26 जुलाई 1999 को कारगिल विजय हासिल हुई थी। शहीद वीरेंद्र कुमार के नाम से गांव में राजकीय शहीद वीरेंद्र कुमार सीनियर सेकेंडरी स्कूल में स्मारक बनाया गया है और उनकी प्रतिमा लगाई गई है।
गांव मोहना निवासी शहीद वीरेंद्र सिंह के बड़े भाई डॉ. हरप्रसाद अत्री ने बताया कि वीरेंद्र अक्तूबर 1998 में फौज में भर्ती हो गए थे। उन्हें जाट रेजिमेंट मिली थी। उनके प्रशिक्षण के अभी छह माह ही हुए थे कि कारगिल युद्ध छिड़ गया। सिपाही वीरेंद्र सिंह जब कारगिल की लड़ाई के लिए गए तो उनकी उम्र केवल 21 साल थी। उनकी तैनाती मश्कोह घाटी में थी। हरप्रसाद बताते हैं कि उनकी बटालियन को आदेश मिलने पर 17 जाट बटालियन के 25 जवानों की टुकड़ी ने 5 जुलाई की रात पिलर नंबर 2 पहाड़ी पर चढ़ाई शुरू कर दी। पहाड़ की चोटी पर बैठे पाकिस्तानी सैनिक व घुसपैठियों ने भारतीय जवानों को आता देख फायरिंग शुरू कर दी। इस दौरान एक गोली वीरेंद्र सिंह के पैर में लगी। गोली लगने के बावजूद वीरेंद्र ने हिम्मत नहीं हारी। 6 जुलाई को तड़के करीब 4.45 बजे भारतीय जवानों और पाकिस्तानी सेना के बीच जमकर गोलीबारी हुई। वीरेंद्र ने कई पाकिस्तानी सिपाहियों को मौत के घाट उतार दिया। चोटी फतह करने के बाद जब उनके साथी गोली निकालने का प्रयास कर रहे थे तभी उनके पास एक गोला आकर गिरा, जिसकी चपेट में आकर वीरेंद्र शहीद हो गए।
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अंतिम संस्कार के पांच दिन बाद बड़े भाई भी पहुंच गए थे मोर्चे पर
डॉ. हरप्रसाद बताते हैं कि उनके बड़े भाई शेर सिंह भी सैनिक रहे हैं। सेना की सिग्नल कोर से सेवानिवृत्त शेर सिंह की कारगिल युद्ध के दौरान तैनाती पोखरण, जेसलमैर में थी। भाई की शहादत की खबर मिलने पर शहीद भाई को अंतिम विदाई देने के लिए सेना ने छुट्टी दी थी। 11 जुलाई 1999 को गांव में ही सैनिक सम्मान के साथ शहीद वीरेंद्र सिंह का अंतिम संस्कार किया था। भाई के अंतिम संस्कार के पांचवें दिन ही वह देश रक्षा के जज्बे से वापस अपनी ड्यूटी पर रवाना हो गए थे।
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भाई-बहनों में सबसे छोटे थे वीरेंद्र
गांव मोहना निवासी कारेलाल और केला देवी के घर में वीरेंद्र सिंह का 1 जनवरी 1978 को हुआ था। वे अपने भाई-बहनों में वह सबसे छोटे थे। प्रत्येक वर्ष 11 जुलाई को शहीद वीरेंद्र का विदाई दिवस मनाया जाता है। कबड्डी के शौकीन वीरेंद्र की याद में हर साल एक जनवरी को उनके जन्मदिन पर कबड्डी प्रतियोगिता भी कराई जाती है, जिसमें सेना के अलावा हरियाणा, उत्तर प्रदेश व पंजाब की टीमें भी हिस्सा लेती हैं।
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