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कैसे मिले आशियाना-5: बिल्डरों के झूठे वादे से परेशान हैं निवेश
योगेश शर्मा/अमर उजाला, फरीदाबाद
Updated Sat, 30 Apr 2016 09:27 AM IST
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- फोटो : अमर उजाला
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राकेश गुप्ता ने साल 2009 में सेक्टर-77 स्थित बीपीटीपी के एलीट फ्लोर प्रोजेक्ट में फ्लैट बुक कराया था। बिल्डर ने 24 महीने में पजेशन देने का वादा किया था, लेकिन सात साल बाद भी फ्लैट पर कब्जा नहीं मिला है। राकेश बताते हैं कि तीन साल से प्रोजेक्ट का काम बंद पड़ा है।
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बिल्डर ने बुकिंग के समय तय कीमत से ज्यादा पैसा भी वसूल लिया। प्रोजेक्ट की लोकेशन ऐसी हैं कि वहां पहुंचना तक आसान नहीं है, क्योंकि न सड़कें और न ही पक्का रास्ता। इतना ही नहीं प्रोजेक्ट जिस जगह बन रहा है, वो जमीन भी विवादित बताई जाती है। ऐसे हालात में फ्लैट मिलने की संभावना दूर-दूर तक नहीं है।
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बिल्डर से परेशान राकेश गुप्ता अकेले शख्स नहीं हैं, बल्कि ऐसे हजारों लोग हैं जिनकी जमापूंजी ग्रेटर फरीदाबाद के बिल्डर प्रोजेक्ट में फंसी हुई है। बुकिंग कराने के तीन से चार साल में आशियाना मिलने की आस थी लेकिन छह से आठ साल बाद भी खरीदारों को ईएमआई और मकान के महंगे किराये की दोहरी मार झेलनी पड़ रही है।
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रियल एस्टेट से जुड़े जानकार बताते हैं कि 2006 से 2010 के बीच पूरे एनसीआर में बिल्डरों की बाढ़ सी आ गई थी। किसी ने सस्ते घर का लालच देकर तो किसी ने ईएमआई में छूट जैसे प्रलोभनों से निवेशकों को लुभाया। एक प्रोजेक्ट के पैसे से दूसरा प्रोजेक्ट खड़ा किया और दूसरे के पैसे से तीसरा। हालात ऐसे बने कि अधिकांश बिल्डरों के प्रोजेक्ट अधूरे पड़े हैं। हालांकि, प्रॉपर्टी बाजार मौजूदा समय में स्लो डाउन से जूझ रहा है। एनसीआर के लाखों निवेशकों का पैसा फंस गया है लेकिन इसके बाद भी बिल्डर तरह तरह की स्कीम से ग्राहकों को रिझाने की कोशिश में जुटे हैं। ऐसे हालात में अगर नए खरीदारों को निवेश में बड़ी सावधानी बरतने की जरूरत है।
रेडी टू मूव में जोखिम कम
रियल एस्टेट मामलों के जानकार मनोज झा बताते हैं कि नए प्रोजेक्ट पर दाव लगाना मौजूदा हालात के हिसाब से सही नहीं है। पुराने प्रोजेक्ट या फिर रेडी टू मूव प्रोजेक्ट निवेश के लिए बेहतर विकल्प साबित हो सकते हैं। इनमें जोखिम की संभावनाएं इसलिए कम होती हैं, क्योंकि रेडी टू मूव प्रोजेक्ट की सही स्थिति का अनुमान लगाना आसान होता है। पुराने प्रोजेक्ट में पहले से ही रह रहे या निवेश कर चुके लोग नए खरीदारों के लिए बेहतर मार्गदर्शक का काम कर सकते हैं। इसके अलावा प्रोजेक्ट की गुणवत्ता को भी आसानी से परखा जा सकता है।
ऐसी स्थिति में बरतें सावधानी
1-बुकिंग के समय फ्लैट की कीमत कम और बाद में ज्यादा पैसा मांगने की शिकायतें सबसे ज्यादा आती हैं। नए खरीदार या नए प्रोजेक्ट में निवेश करने वालों को हिडन चार्ज पर ध्यान देने की जरूरत है। इसमें क्लब की सदस्यता, पानी-बिजली कनेक्शन और सिक्योरिटी का खर्च शामिल हो सकता है।
2-फ्लैट या कोई अन्य प्रॉपर्टी खरीदने से पहले तय कर लें कि मकसद क्या है। निवेश यदि मकसद है तो किसी भी शहर में प्रॉपर्टी ली जा सकती है लेकिन रहने के लिए प्रॉपर्टी लेनी है तो पूरी तरह जांच परख लें। इसमें प्रोजेक्ट की लोकेशन और उसकी गुणवत्ता काफी मायने रखती है।
3-किसी भी प्रोजेक्ट में निवेश करने से पहले उसके पेमेंट के प्लान को ध्यान से देखें। कब-कब कितना पैसा दिया जाना है और बिल्डर ने लोन के लिए किस बैंक को अधिकृत किया हुआ है, इस पर भी विशेष ध्यान देने की जरूरत है। क्योंकि अधिकांश लोग लोन लेकर ही घर खरीदते हैं।
4-निवेश करने से पहले बिल्डर की गुडविल मार्केट में कैसी, इस पर ध्यान देने की जरूरत है। बिल्डिंग का नक्शा व लेआउट प्लान पास हुआ या नहीं, इसकी जानकारी हासिल कर लें। इसके अलावा बिल्डर के अन्य जगह बने प्रोजेक्ट से उसकी गुडविल का पता लगाना आसान हो जाता है।
5-प्रोजेक्ट जहां बनाया जा रहा है या फिर बन चुका है, उस जमीन का टाइटल क्या है। जमीन आवंटन किसके नाम से है। जमीन की रजिस्ट्री किसके नाम से है और नक्शा पास हुआ है या नहीं। इसकी जानकारी हासिल करना भी बेहद जरूरी हो जाता है।
6-अगर आप फ्लैट खरीदने जा रहे हैं तो यह देखिए कि बिल्डर को कंस्ट्रक्शन शुरू करने की इजाजत मिली है या नहीं। बिल्डर इस बारे में बरगलाने की कोशिश करते हैं। इसके लिए संबंधित विभाग से जानकारी हासिल करें। आरटीआई का सहारा भी लिया जा सकता है।
7-पजेशन में देरी की शिकायतें सबसे ज्यादा होती हैं। ऐसे में फ्लैट बुक करने से पहले एग्रीमेंट की शर्तों पर ध्यान दें। बिल्डर ने पजेशन देने के लिए कितना समय लिया है और पजेशन न मिलने पर एग्रीमेंट में क्या प्रावधान हैं। इस पर फोकस होना जरूरी है। प्रोजेक्ट अगर लेट होता है तो उसकी कीमत बढ़नी तय होती है।
अमर उजाला की मुहिम की सराहना
अमर उजाला की मुहिम को निवेशकों ने भी सराहा है। सोशल मीडिया में ग्रेटर फरीदाबाद का मुद्दा छाया हुआ है। वाट्ऐप पर दिए गए संदेश में रेनू खट्टर कहती हैं कि हजारों निवेशकों के दर्द को अमर उजाला ने बेहतर तरीके से बयां किया है। ग्रेफ के मुद्दे पर लगातार चलाई जा रही सीरीज बिल्डर-पोलिटीशियन गठजोड़ की तरफ भी इशारा करती है। प्रमोद मिनोचा ने कहा कि अमर उजाला ने निष्पक्ष तरीके से लगातार ग्रेफ के हजारों लोगों की आवाज उठाई है। कृष्ण कटारिया ने बिल्डर और राजनेताओं की मिलीभगत को ग्रेफ की समस्या का जिम्मेदार ठहराते हुए अमर उजाला की मुहिम को सराहा है। देवेंद्र सिंह ने भी कुछ इसी अंदाज में मुहिम की सराहना की है।
अपना मंच
बीपीटीपी के सेक्टर-84 स्थित एलीट फ्लोर प्रोजेक्ट में मैंने 2013 में रिसेल के तहत फ्लैट लिया था। उम्मीद थी कि छह महीने में फ्लैट पर कब्जा मिल जाएगा। मैंने रिटायरमेंट फंड और लोन लेकर बिल्डर को पैमेंट कर दी लेकिन पजेशन आज तक नहीं मिला है। प्रोजेक्ट तीन साल पहले जिस हाल में था, आज भी वैसा ही है। अगले दो साल तक फ्लैट मिलने की संभावना नहीं दिख रही।- श्यामसुंदर, निवेशक
मैंने सेक्टर-87 के एसआरएस पर्ल फ्लोर प्रोजेक्ट में 2009 में फ्लैट लिया था। पजेशन तो मिल गई लेकिन सरकार और बिल्डर के बीच खींचतान का खामियाजा यहां रहने वालों को उठाना पड़ रहा है। न सड़कें हैं और न ही सीवर लाइन की व्यवस्था है। 2100 रुपये मेंटेनेंस चार्ज लिया जाता है लेकिन सोसायटी के अंदर टूटी सड़कें ठीक नहीं हो पाती हैं। गुणवत्ता खराब होने से बिल्डिंग का सीमेंट झड़ने लगा है।- कृष्ण कटारिया, निवेशक
मैने 2006 में सेक्टर-89 के पाल ग्रुप के प्रोजेक्ट में फ्लैट की बुकिंग कराई थी। फ्लैट की आधी कीमत का भुगतान कर चुका हूं। बिल्डर ने तीन साल के अंदर पजेशन देने का वादा किया था लेकिन दस साल बाद भी फ्लैट नहीं मिला है। बिल्डर ने प्रोजेक्ट में देरी पर भुगतान करने का आश्वासन भी दिया था। आज तक न तो फ्लैट मिला है और न ही पैसा वापस मिला है।- रविंद्र कुमार, निवेशक