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Faridabad News: नवरात्र से पहले घरों में सजने लगी झांझी माता

Wed, 07 Oct 2026 12:18 AM IST
Noida Bureau नोएडा ब्यूरो
Updated Wed, 07 Oct 2026 12:18 AM IST
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Homes begin to be adorned with the image of Jhanjhi Mata ahead of Navratri.
नौ दिन तक विधि-विधान से पूजा, शाम को लोकगीतों के साथ महिलाएं करती हैं आराधना
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भारती दुबे
फरीदाबाद। शारदीय नवरात्र 11 अक्तूबर से शुरू होने जा रहे हैं। नवरात्र से पहले शहर में कई क्षेत्रों में घरों में झांझी (सांझी) माता बनाने की तैयारियां शुरू हो गई हैं। बदलते समय के बावजूद कई परिवार आज भी दीवार पर देवी मां की प्रतिमा बनाकर नौ दिन तक विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं। हालांकि, कुछ परिवार आधुनिकता के चक्कर में इस परंपरा को भूलते भी जा रहे हैं।

बापू नगर निवासी कॉलेज छात्रा योगिता ने बताया कि शाम के समय महिलाएं झांझी माता के सामने एकत्र होकर पारंपरिक लोकगीत गाती हैं। इससे घरों में भक्ति के साथ पुरानी लोकसंस्कृति की झलक भी देखने को मिलती है। गोबर से झांझी बनाई जाती है। इसे बनाने की तैयारी शुरू कर दी गई है। इसके बाद सेलखड़ी और देसी रंगों से प्रतिमा को सजाया जाता है। वहीं कुछ जगहों पर चूल्हे वाली पीली मिट्टी से दीवार पर देवी मां की आकृति तैयार की जाती है। आटे की लोई और चमकीले कागजों की मदद से माता के वस्त्र और आभूषण बनाए जाते हैं। कई घरों में झांझी को आकर्षक रूप देने के लिए फूल-पत्तियों से भी सजावट की जाती है।
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दीप जलाकर व्रत शुरू करती हैं महिलाएं

महिलाएं झांझी माता के सामने दीप जलाकर व्रत शुरू करती हैं। सुबह पूजा के बाद मंदिर जाकर देवी मां की आराधना करने की परंपरा भी है। कई महिलाएं नौ दिन तक जमीन पर सोने और नंगे पैर रहने जैसे नियमों का पालन करती हैं। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार कुछ महिलाएं शाम तक अन्न और पानी का सेवन नहीं करतीं। सेक्टर - 10 निवासी अर्चना और अनखीर गांव निवासी मनीषा ने बताया कि शाम को महिलाएं झांझी माता के सामने बैठकर पारंपरिक लोकगीत गाती हैं। झांझी-झांझी जै लै, झांझी मांगे घी, बताओ कहां से लाऊं’ जैसे गीतों के साथ माता को भोग लगाया जाता है। अंतिम नवरात्र पर पूजा के बाद झांझी को दीवार से उतारकर तालाब या जोहड़ में विसर्जित करने की परंपरा है।
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केसूला मांगने की परंपरा

नवरात्र के दौरान बच्चों के केसूला मांगने की परंपरा भी कई क्षेत्रों में देखने को मिलती है। बच्चे मिट्टी के दीपक लेकर घर-घर जाते हैं और लोकगीत गाते हुए केसूला मांगते हैं। इस दौरान उन्हें अनाज और रुपये देने की परंपरा है। बुजुर्गों का कहना है कि झांझी माता की यह परंपरा नई पीढ़ी को स्थानीय संस्कृति और लोकगीतों से जोड़ने का माध्यम भी बनी हुई है।
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