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Faridabad News: लोकगीत प्रस्तुति ने नहीं भरता पेट, मजदूरी भी करते हैं 'जोगिया'

Sat, 11 Nov 2023 11:23 PM IST
Noida Bureau नोएडा ब्यूरो
Updated Sat, 11 Nov 2023 11:23 PM IST
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Folk song presentation does not fill the stomach, 'Jogia' also works as a laborer
सूरजकुंड मेले में सारंगी-ढपली बजाकर गीतों की देते हैं प्रस्तुति, देश-विदेश में हरियाणवी संस्कृति का चेहरा
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अब भावी पीढ़ी को नहीं सौंपना चाहते हरियाणवीं कला की कमान, विलुप्त हो रही संस्कृति और परंपरा
संदीप वर्मा

फरीदाबाद। जयमल फत्ता, भूरा बादल की वीर गाथाएं हों या रानी निहालदेई और हीर रांझा की कहानियों को सारंगी की धुनों पर गा-गाकर सुनाने वाले 'जोगिया' अब अपनी भावी पीढ़ी को इस परंपरा से कोसों दूर रखना चाहते हैं। सूरजकुंड मेले में विश्वभर से आए लोगों के सामने हरियाणवी लोक संगीत का परिचायक बने यह कलाकार अक्सर काम न मिलने पर गांवों में मजदूरी कर परिवार का पेट पालते हैं। मेला खत्म होने के बाद कलाकारों ने अपनी कहानी सांझा की।
कैथल के गांव काठना से आए राम नाथ, राम पाल समेत छह कलाकारों का समूह प्रत्येक वर्ष फरवरी में होने वाले सूरजकुंड मेले में आकर अपने गीतों से पर्यटकों का मनोरंजन करता है। पहली बार नवंबर में दीपावली मेले में उन्हें अपनी लोक कला को दिखाने का मौका मिल रहा है। कलाकारों को कुरुक्षेत्र में होने वाली गीता जयंती में शासन की ओर से प्रस्तुति के लिए बुलाया जाता है। इन कार्यक्रमों से उन्हें प्रतिदिन के हिसाब से कमाई (लगभग दो से ढाई हजार रुपये) हो जाती है। मेले के अलावा अन्य दिनों में आसपास के गांवों में माह में दो या तीन बार किसी शादी-समारोह में प्रस्तुति देने का मौका मिल जाता है लेकिन इससे कलाकारों का घर नहीं चलता। ऐसे में जब काम नहीं मिलता तो परिवार का पेट पालने के लिए मजबूरी में इन कलाकारों को मजदूरी भी करनी पड़ती है।
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सूरजकुंड में रामनाथ, रामपाल, इंदर सिंह, महावीर, ब्रम्हा और राजेंद्र का समूह अपने गीतों से पर्यटकों को अपने संगीत के जादू से मंत्रमुग्ध कर रहे हैं। उनकी कई पीढि़यों से हरियाणवी लोक संगीत की परंपरा चली आ रही है। रामनाथ बताते हैं कि यहां की कमाई से कुछ दिन तो गुजारा होता है लेकिन फिर हाथ खाली हो जाते हैं। बेहद गुरबत में हमें दिन गुजारने पड़ते हैं। उनके तीन बच्चे हैं। ऐसे में उन्होंने अपने किसी भी बच्चे को यह परंपरा नहीं सिखाई है। हम हर दुख सहकर भी अपने बच्चों को पढ़ा रहे हैं, जिससे वह कोई अच्छी नौकरी कर सके और गरीबी के दिन न जिए। रामपाल, इंदर सिंह, महावीर, ब्रम्हा और राजेंद्र ने भी कुछ ऐसे ही विचार व्यक्त किए।
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सारंगी और ढपली की धुनों पर सुनाते हैं हीर-रांझा का किस्सा

लोकगीत कलाकार सारंगी और ढपली की धुनों पर राग और साखा सुनाते हैं। कलाकार हीर-रांझा और निहालदेई की संगीतमय कहानी सुनाते हैं। इसके अलावा जयमल फत्ता, भूरा बादल की वीर कहानियां भी गीतों में पिरोकर सुनाते हैं। हरियाणा में इन लोकगीत कलाकारों को जोगिया और रांझा कहकर भी पुकारते हैं।

मुख्यमंत्री ने किया था वादा लेकिन सरकार से वेतन
कलाकार इंदर सिंह का कहना है कि पिछले वर्ष ही चंडीगढ़ में मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर से मिलकर उन्हें समस्या बताई थी। उनका दावा है कि सीएम ने उन्हें आश्वासन दिया था कि इन कलाकारों को दस हजार रुपये माह में दिए जाएंगे। इसके अलावा वृद्ध होने पर उन्हें पेंशन का भी प्रस्ताव था लेकिन इसपर आजतक कोई काम नहीं हुआ। उनका कहना है कि यदि ऐसे हालात रहे तो आगे चलकर यह कला भी विलुप्त हो जाएगी।
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