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Faridabad News: हाईवे-एक्सप्रेसवे के नजदीक स्वास्थ्य केंद्रों में बढ़ाई जाएंगी सुविधाएं
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भारत सरकार की गाइडलाइन के अनुसार 50 किलोमीटर के दायरे में नहीं बन सकते दो ट्रॉमा सेंटर
संवाद न्यूज एजेंसी
फरीदाबाद। बीके अस्पताल में ट्रॉमा सेंटर की सुविधा नहीं है ऐसे में राज्य सरकार की ओर से शहर में अलग अलग क्षेत्रों में बने प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को अपग्रेड करने पर विचार किया जा रहा है। सरकार की सबसे पहली प्राथमिकता हाईवे और एक्सप्रेसवे के आसपास लगने वाले स्वास्थ्य केंद्र रहेंगे। उनमें मूल्यांकन सिस्टम के तहत घायल व्यक्ति को अलग अगल श्रेणी में रख कर इलाज किया जाएगा। इससे दिल्ली के एम्स में मरीजों की भीड़ कम होगी।
स्वास्थ्य विभाग की ओर से शहर में 10 साल से ट्रॉमा सेंटर की मांग की चल रही है। वहीं, भारत सरकार की गाइडलाइन के अनुसार शहर में ट्रॉमा सेंटर नहीं बन सकता है। गाइडलाइन के आधार पर 50 किलोमीटर के दायरे में दो ट्रॉमा सेंटर नहीं बन सकते हैं क्योंकि दिल्ली से फरीदाबाद की दूरी 50 किलोमीटर से कम है। इस स्थिति में शहर में ट्रॉमा सेंटर नहीं बन सकता है। वहीं, इस स्थिति से निपटने के लिए राज्य सरकार की ओर से शहर के प्राथमिक और सामुदायिक केंद्रों को अपग्रेड करने पर विचार किया जा रहा है। इसके लिए हाइवे और एक्सप्रेसवे के आसपास के प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर सबसे ज्यादा ध्यान केंद्रित किया जाएगा। इन केंद्रों के अपग्रेड होने से मरीजों की हालत ज्यादा गंभीर होने पर ही दिल्ली के लिए रेफर किया जाएगा। इससे दिल्ली के एम्स में मरीजों की भीड़ कम होगी।
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सीएचसी और पीएचसी सेंटरों को अपग्रेड तैयारी
शहर में ट्रॉमा सेंटर न बनने की स्थिति में सरकार की ओर से हाइवे और एक्सप्रेसवे के आसपास के सभी सीएचसी और पीएचसी सेंटरों को अपग्रेड करने पर विचार किया जा रहा है। इन सेंटरों के अपग्रेड होने पर इनमें ट्राइएज सिस्टम के तहत घायल व्यक्ति को अलग अगल श्रेणी में रख कर इलाज किया जाएगा। इसमें ज्यादा गंभीर मरीजों को लाल जोन में, उससे कम गंभीर मरीज को पीले जोन में और केवल चोट वाले मरीज को हरे जोन में रखा जाएगा। इसके साथ ही व्यक्ति की मौत होने पर उसे काले जोन में रखा जाएगा।
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28 लाख की आबादी पर केवल एक बीके अस्पताल
शहर में 28 लाख की आबादी पर केवल एक बीके अस्पताल है। इस 200 बेड वाले अस्पताल के आपातकालीन विभाग में प्रतिदिन करीब 60 मरीज पहुंचते हैं। जिसमें अधिकतर सड़क दुर्घटना वाले मरीज आते हैं लेकिन अस्पताल में आईसीयू और ट्रॉमा सेंटर न होने के कारण उनको दिल्ली के एम्स के लिए रेफर कर दिया जाता है। कई बार मरीजों की हालत गंभीर होने की वजह से रास्ते में ही उनकी मौत हो जाती है।
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वर्जन
भारत सरकार की गाइडलाइन के अनुसार 50 किलोमीटर के अंदर दो ट्रॉमा सेंटर नहीं बन सकते हैं। इस वजह से शहर में ट्रॉमा सेंटर नहीं बन सकता है। इसके समाधान के लिए राज्य सरकार की ओर से हाइवे और एक्सप्रेसवे के आसपास के सीएचसी और पीएचसी को अपग्रेड करने के लिए विचार किया जा रहा है। इन केंद्रों के अपग्रेड होने से दिल्ली के एम्स के ट्रॉमा सेंटर पर मरीजों का भार कम हो जाएगा। -डॉ. एमपी सिंह, रेफरल ट्रांस्पोर्ट, नोडल अधिकारी
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संवाद न्यूज एजेंसी
फरीदाबाद। बीके अस्पताल में ट्रॉमा सेंटर की सुविधा नहीं है ऐसे में राज्य सरकार की ओर से शहर में अलग अलग क्षेत्रों में बने प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को अपग्रेड करने पर विचार किया जा रहा है। सरकार की सबसे पहली प्राथमिकता हाईवे और एक्सप्रेसवे के आसपास लगने वाले स्वास्थ्य केंद्र रहेंगे। उनमें मूल्यांकन सिस्टम के तहत घायल व्यक्ति को अलग अगल श्रेणी में रख कर इलाज किया जाएगा। इससे दिल्ली के एम्स में मरीजों की भीड़ कम होगी।
स्वास्थ्य विभाग की ओर से शहर में 10 साल से ट्रॉमा सेंटर की मांग की चल रही है। वहीं, भारत सरकार की गाइडलाइन के अनुसार शहर में ट्रॉमा सेंटर नहीं बन सकता है। गाइडलाइन के आधार पर 50 किलोमीटर के दायरे में दो ट्रॉमा सेंटर नहीं बन सकते हैं क्योंकि दिल्ली से फरीदाबाद की दूरी 50 किलोमीटर से कम है। इस स्थिति में शहर में ट्रॉमा सेंटर नहीं बन सकता है। वहीं, इस स्थिति से निपटने के लिए राज्य सरकार की ओर से शहर के प्राथमिक और सामुदायिक केंद्रों को अपग्रेड करने पर विचार किया जा रहा है। इसके लिए हाइवे और एक्सप्रेसवे के आसपास के प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर सबसे ज्यादा ध्यान केंद्रित किया जाएगा। इन केंद्रों के अपग्रेड होने से मरीजों की हालत ज्यादा गंभीर होने पर ही दिल्ली के लिए रेफर किया जाएगा। इससे दिल्ली के एम्स में मरीजों की भीड़ कम होगी।
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सीएचसी और पीएचसी सेंटरों को अपग्रेड तैयारी
शहर में ट्रॉमा सेंटर न बनने की स्थिति में सरकार की ओर से हाइवे और एक्सप्रेसवे के आसपास के सभी सीएचसी और पीएचसी सेंटरों को अपग्रेड करने पर विचार किया जा रहा है। इन सेंटरों के अपग्रेड होने पर इनमें ट्राइएज सिस्टम के तहत घायल व्यक्ति को अलग अगल श्रेणी में रख कर इलाज किया जाएगा। इसमें ज्यादा गंभीर मरीजों को लाल जोन में, उससे कम गंभीर मरीज को पीले जोन में और केवल चोट वाले मरीज को हरे जोन में रखा जाएगा। इसके साथ ही व्यक्ति की मौत होने पर उसे काले जोन में रखा जाएगा।
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28 लाख की आबादी पर केवल एक बीके अस्पताल
शहर में 28 लाख की आबादी पर केवल एक बीके अस्पताल है। इस 200 बेड वाले अस्पताल के आपातकालीन विभाग में प्रतिदिन करीब 60 मरीज पहुंचते हैं। जिसमें अधिकतर सड़क दुर्घटना वाले मरीज आते हैं लेकिन अस्पताल में आईसीयू और ट्रॉमा सेंटर न होने के कारण उनको दिल्ली के एम्स के लिए रेफर कर दिया जाता है। कई बार मरीजों की हालत गंभीर होने की वजह से रास्ते में ही उनकी मौत हो जाती है।
वर्जन
भारत सरकार की गाइडलाइन के अनुसार 50 किलोमीटर के अंदर दो ट्रॉमा सेंटर नहीं बन सकते हैं। इस वजह से शहर में ट्रॉमा सेंटर नहीं बन सकता है। इसके समाधान के लिए राज्य सरकार की ओर से हाइवे और एक्सप्रेसवे के आसपास के सीएचसी और पीएचसी को अपग्रेड करने के लिए विचार किया जा रहा है। इन केंद्रों के अपग्रेड होने से दिल्ली के एम्स के ट्रॉमा सेंटर पर मरीजों का भार कम हो जाएगा। -डॉ. एमपी सिंह, रेफरल ट्रांस्पोर्ट, नोडल अधिकारी