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Faridabad News: शहीद वीरेंद्र की याद में आज भी आंखें हो जाती हैं नम

Sat, 26 Jul 2025 12:30 AM IST
Noida Bureau नोएडा ब्यूरो
Updated Sat, 26 Jul 2025 12:30 AM IST
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Even today my eyes get moist in the memory of martyr Virendra
कारगिल युद्ध में पैर में गोली लगने पर भी नहीं रुके थे कदम
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संवाद न्यूज एजेंसी
बल्लभगढ़। भारत-पाक के बीच साल 1999 में हुए कारगिल युद्ध में शहीद हुए जवानों में गांव मोहना के रहने वाले वीरेंद्र सिंह अत्री को भी याद किया जाता है। गांव व परिवार के लोग 11 जुलाई को उनकी याद में हवन करते हैं। वहीं आज भी वीरेंद्र की मां लीला देवी की छोटे बेटे की याद में आंखें नम हो जाती हैं। कारगिल युद्ध में शहीद जवानों की याद में 26 जुलाई को विजय दिवस मनाया जाता है।

गांव के सरकारी स्कूल का नाम शहीद वीरेंद्र सिंह के नाम पर रखा गया। वहीं यमुना को जाने वाली सड़क का नाम भी उनके नाम पर रखा गया है। प्रशासन की ओर से करीब 22 साल बाद उनके परिवार को गांव में 200 गज का प्लॉट दिया गया है।
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सिपाही वीरेंद्र सिंह अत्री का जन्म 1 जनवरी 1978 को हरियाणा के फरीदाबाद जिले की बल्लभगढ़ तहसील के मोहना गांव में कारे लाल एवं लीला देवी के परिवार में हुआ था। वह अपने 11 भाई-बहनों में सबसे छोटे थे। बड़े भाई डॉक्टर हरप्रसाद अत्री ने बताया कि अक्टूबर 1998 में वह भारतीय सेना की जाट रेजिमेंट में भर्ती हुए थे। उनके प्रशिक्षण के अभी छह माह ही हुए थे कि कारगिल युद्ध छिड़ गया।
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वीरेंद्र सिंह जब कारगिल की लड़ाई के लिए गए तो उनकी उम्र महज 21 साल थी। उस समय उनकी तैनाती मस्कोह घाटी में थी। अधिकारियों के आदेश मिलने पर 25 जवानों की टुकड़ी ने 5 जुलाई 1999 की रात 8 बजे पिंपल 2 पहाड़ी पर चढ़ाई शुरू कर दी। पहाड़ी की चोटी पर बैठे दुश्मनों ने भारतीय सैनिकों को आता देख फायरिंग शुरू कर दी। इस बीच वीरेंद्र सिंह के पैर में एक गोली लग गई।

गोली लगने के बाद भी नहीं मानी हार
डॉ. हरप्रसाद ने बताया कि उनके साथियों ने उनको बताया था कि वीरेंद्र को गोली लगने के बावजूद उसने हिम्मत नहीं हारी और 6 जुलाई की सुबह 4:45 बजे भारतीय जवानों ने वहां मौजूद पाकिस्तानी सैनिकों को ढेर करके चोटी पर फतह हासिल की थी। फतह हासिल करने के बाद उनके अन्य साथियों ने वीरेंद्र के पैर से गोली निकालने का प्रयास किया, तभी एक गोला उसके पास आकर गिरा और वीरेंद्र अत्री शहीद हो गए।


11 जुलाई को मनाते हैं बलिदान दिवस
11 जुलाई 1999 को वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय में राजकीय व सैनिक सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया था। ग्रामीण और परिजन 11 जुलाई को बलिदान दिवस के रूप में मनाते हैं। सरकार ने इनके सम्मान में गांव के सरकारी स्कूल का नाम शहीद वीरेंद्र सिंह राजकीय सीनियर सेकेंडरी स्कूल रखा है। गांव में उनका स्मारक भी बनाया गया है।
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