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Faridabad News: इंसानाें के साथ पेड़ों का भी दम घोंट रही धूल

Wed, 18 Feb 2026 12:15 AM IST
Noida Bureau नोएडा ब्यूरो
Updated Wed, 18 Feb 2026 12:15 AM IST
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Dust is choking trees along with humans
जिले के 5.72 लाख पेड़ों की घट रही सांसे, पत्तियों पर जमी धूल ने बंद की स्टोमेटा प्रक्रिया
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सचिन कुमार
फरीदाबाद। हवा में बढ़ती धूल अब सिर्फ इंसानों की सांसों पर ही नहीं, बल्कि पेड़ों की सांस लेने की क्षमता पर भी असर डाल रही है। वैज्ञानिक अध्ययनों में पाया गया है कि पत्तियों पर जमी धूल प्रकाश संश्लेषण (फोटोसिंथेसिस) की दर को 20 से 35 प्रतिशत तक कम कर सकती है। यदि यही स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो शहर की प्राकृतिक ऑक्सीजन उत्पादन क्षमता प्रभावित हो सकती है। वर्तमान में बल्लभगढ़ क्षेत्र का वायु गुणवत्ता सूचकांक 242 दर्ज किया गया है, जो खराब श्रेणी में आता है, जबकि फरीदाबाद शहर का 148 है, जो मध्यम श्रेणी में है। एक्यूआई जितना अधिक होगा, हवा में उतने ही अधिक सूक्ष्म कण (पीएम10, पीएम 2.5) मौजूद होंगे और यही कण पेड़ों की पत्तियों पर धूल बनकर जमते हैं।

हरियाणा वन विभाग की 2024 की वृक्ष बाहरी जंगल (टीओएफ) गणना के अनुसार, फरीदाबाद जिले में करीब पांच लाख 72 हजार पेड़ दर्ज किए गए हैं। इन पेड़ों का बड़ा हिस्सा धूल से प्रभावित है, तो शहर की वायु शुद्धिकरण क्षमता में उल्लेखनीय कमी आ सकती है। निर्माण स्थलों से उड़ती मिट्टी, सड़कों की खुदाई, औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले सूक्ष्म कण और भारी वाहनों की आवाजाही धूल जमने के प्रमुख कारण माने गए हैं। औद्योगिक और यातायात प्रभावित इलाकों में यह समस्या अधिक गंभीर पाई गई है। सड़क किनारे लगे पेड़ों की पत्तियों पर जमी धूल स्टोमेटा (सूक्ष्म छिद्र) को आंशिक रूप से बंद कर देती है।
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धूल से स्टोमेटा भी प्रभावित


स्टोमेटा पत्तियों की सतह पर मौजूद सूक्ष्म छिद्र होते हैं। यही पौधों के लिए गैसों के आदान-प्रदान का माध्यम हैं। यहीं से पौधे कार्बन डाइऑक्साइड अंदर लेते हैं और ऑक्सीजन बाहर छोड़ते हैं। जब धूल इन छिद्रों पर जम जाती है, तो वे आंशिक रूप से बंद हो जाते हैं। इससे गैस विनिमय धीमा पड़ता है और प्रकाश संश्लेषण की गति कम हो जाती है। डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय के एक अध्ययन में पाया गया कि सड़क किनारे और औद्योगिक क्षेत्रों में लगे पेड़ों की पत्तियों पर धूल जमने से स्टोमेटा की सक्रियता कम हुई और फोटोसिंथेटिक दर में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई।
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प्रकाश संश्लेषण क्या है और क्यों अहम है

प्रकाश संश्लेषण वह जैव-रासायनिक प्रक्रिया है जिसके जरिए पौधे सूर्य के प्रकाश की ऊर्जा का उपयोग करके कार्बन डाइऑक्साइड और पानी से भोजन (ग्लूकोज) बनाते हैं व ऑक्सीजन वातावरण में छोड़ते हैं। सरल शब्दों में समझते हैं, पेड़ कार्बन डाइऑक्साइड लेते हैं, सूर्य की रोशनी से उसे ऊर्जा में बदलते हैं और बदले में हमें ऑक्सीजन देते हैं। यदि इस प्रक्रिया की गति घटती है तो, कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषण कम होगा जिस वजह से ऑक्सीजन उत्सर्जन घटेगा और वायु शुद्धिकरण क्षमता कमजोर होगी।


धूल से गैस विनिमय में 15-40 प्रतिशत तक बाधा



भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) से जुड़े वैज्ञानिक प्रकाशनों और पर्यावरणीय शोध पत्रों में भी यह उल्लेख मिलता है कि अत्यधिक धूल वाले क्षेत्रों में पत्तियों की सतह पर जमा कण गैस विनिमय प्रक्रिया को 15 से 40 प्रतिशत तक प्रभावित कर सकते हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद से जुड़े शोधों में उल्लेख है कि धूल की परत पत्तियों की सतह पर जमकर सूर्य का प्रकाश अंदर तक पहुंचने से रोकती है। इससे क्लोरोफिल कम सक्रिय होता है और ऊर्जा निर्माण घट जाता है।


एक व्यक्ति को 700-750 किलोग्राम ऑक्सीजन की आवश्यकता



पर्यावरणविद् डॉ. अनिल जोशी के अनुसार, एक व्यक्ति को वर्षभर में लगभग 700-750 किलोग्राम ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है। इतनी मात्रा के उत्पादन के लिए औसतन सात से आठ स्वस्थ, परिपक्व पेड़ों की जरूरत पड़ती है। यदि किसी शहर में पेड़ों की कार्यक्षमता औसतन 25 प्रतिशत घट जाए, तो उसी अनुपात में ऑक्सीजन उत्पादन भी कम हो सकता है।
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