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Faridabad News: सरकारी नौकरी छोड़ अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में कूद पड़े थे पहले सांसद धर्मवीर
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1977 में बनी फरीदाबाद सीट से पहले सांसद बने थे, बापू से प्रेरित होकर स्वतंत्रता आंदोलन में आए थे
हेमलता रावत
बल्लभगढ़। 1977 में बनी फरीदाबाद सीट से पहले सांसद बनने वाले धर्मवीर वशिष्ठ बड़े स्वतंत्रता सेनानी भी रहे थे। वह गांधीजी से प्रेरित थे। वर्ष 1942 में सरकारी नौकरी से त्यागपत्र देकर वह अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में कूद पड़े थे। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद पिता के नक्शे-कदम पर चलते हुए 1952 में वह हसनपुर विधानसभा सीट से विधायक रहे थे। 1975 में इमरजेंसी के बाद एक बार फिर से उन्होंने सरकार के खिलाफ आंदोलन छेड़ा और 1977 में भारतीय लोकदल से सांसद चुने गए थे। उनके पिता भी स्वतंत्रता सेनानी रहे थे और 1946 में पंजाब-हरियाणा प्रदेश से विधायक रहे थे।
गांव सीही निवासी धर्मवीर वशिष्ठ के बड़े बेटे सत्यवीर वशिष्ठ ने बताया कि पिता धर्मवीर आबकारी विभाग में कार्यरत थे। वर्ष 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में अपना सहयोग देने के लिए उनके पिता धर्मवीर वशिष्ठ ने सरकारी नौकरी छोड़ दी थी। इस दौरान देश को आजाद कराने के लिए अंग्रेजों की लाठियां खाईं और जेल भी गए। स्वतंत्रता प्राप्त होने के बाद 1952 में बनी पंजाब और हरियाणा प्रदेश की पहली विधानसभा में हसनपुर से खड़े हुए और जनता ने उनको चुनकर विधानसभा भेजा। उस वक्त हसनपुर सीट हसनपुर क्षेत्र से लेकर बदरपुर बॉर्डर तक एक ही विधानसभा हुआ करती थी। उस समय धर्मवीर वशिष्ठ कांग्रेस पार्टी से हसनपुर से विधानसभा सीट पर खड़े और जीत हासिल की।
इंदिरा गांधी की नीतियों का खुलकर विरोध किया था
स्वभाव से शांत और बेहद प्रखर वक्ता धर्मवीर वशिष्ठ ने उस दौरान प्रधानमंत्री रहीं इंदिरा गांधी की नीतियों का खुलकर विरोध किया था। वह चौधरी चरण सिंह के साथ आंदोलन से जुड़ गए थे। 22 माह बाद 1977 में जब परिसीमन के बाद फरीदाबाद सीट का गठन हुआ, तो फरीदाबाद के पहले और देश के छठे लोकसभा चुनावों के दौरान वह कांग्रेस के खिलाफ मैदान में उतर पड़े। इस दौरान फरीदाबाद सीट से सात उम्मीदवारों ने सांसद का चुनाव लड़ा था। इसी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के खिलाफ लोगों में इतनी नाराजगी थी कि इस सीट पर 70.81 प्रतिशत बंपर वोटिंग हुई। भारतीय लोकदल धर्मवीर वशिष्ठ ने 63 वर्ष की उम्र में सांसद का चुनाव लड़ा था। उनको 44.30 प्रतिशत, निर्दलीय खुर्शीद अहमद को 37.75, कांग्रेस के तैयब हुसैन को 13.91 प्रतिशत वोट मिले। भारतीय लोक पार्टी के उम्मीदवार धर्मवीर वशिष्ठ इस चुनाव को जीतकर फरीदाबाद से पहले सांसद बने थे। उन्होंने एक लाख 84 हजार 948 वोट हासिल किए थे। उन्होंने वर्ष 1980 में दोबारा जनता पार्टी से चुनाव लड़ा। उस समय उनको लोगों का प्यार नहीं मिलने की वजह से वह तीसरे नंबर पर रहे। उनको 26.5 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए थे। उसके बाद उन्होंने राजनीति से नाता छोड़ दिया। साल 1990 में उनकी मृत्यु हो गई।
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कार्यक्रम के दौरान ही धर्मवीर का नाम किया घोषित
साल 1977 में पलवल में एक समारोह का आयोजन किया गया था, जिसमें मंच पर पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह ने अचानक से गांव सीही निवासी धर्मवीर वशिष्ठ का नाम घोषित कर दिया। उस समय जो लहर चल रही थी उससे यही अंदाजा लगाया जा रहा था कि खुर्शीद अहमद को उम्मीदवार घोषित किया जाएगा। अचानक क्षेत्रीय समीकरण की जानकारी होते ही चौधरी चरण सिंह ने बिना किसी से कोई विचार विमर्श किए समारोह के दौरान ही लोगों के सामने धर्मवीर वशिष्ठ का नाम घोषित कर दिया था।
बेटे ने भी कॉलेज में बनाया चुनावी कार्यालय
धर्मवीर वशिष्ठ के बड़े बेटे सत्यवीर वशिष्ठ ने बताया कि जिस समय उनके पिता का नाम सांसद पद के लिए घोषित किया गया, उस समय सत्यवीर वाईएमसीए कॉलेज से इंजीनियर की पढ़ाई कर रहे थे। आपातकाल लागू होने की वजह से कॉलेज की ओर से कोई रोक टोक नहीं थी। उन्होंने हॉस्टल के एक कमरे में पिता के प्रचार प्रसार के लिए कार्यालय खोल दिया। पढ़ाई के बाद वह अपने पिता के साथ जगह जगह जाकर प्रचार करते थे। उस समय वह कॉलेज की यूनियन में उपप्रधान के पद पर कार्यरत थे।
जब अंग्रेजों के सामने नहीं डिगे तो और किसी से क्या डरेंगे
छोटे बेटे संतवीर
ने बताया कि 25 जून 1975 से लगा आपातकाल लगभग 21 माह तक चला। उस दौरान लोगों ने उनके पिता धर्मवीर से भूमिगत होने के लिए कहा। उन्होंने जवाब दिया कि जब अंग्रेजों के सामने वह नहीं डिगे तो और किसी से क्या डरेंगे। उन्होंने लोगों की बात नहीं सुनी और प्रचार करते हुए लोगों के बीच रहे। अंत में चुनाव का नतीजा जीत के रूप में सामने आया।
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हेमलता रावत
बल्लभगढ़। 1977 में बनी फरीदाबाद सीट से पहले सांसद बनने वाले धर्मवीर वशिष्ठ बड़े स्वतंत्रता सेनानी भी रहे थे। वह गांधीजी से प्रेरित थे। वर्ष 1942 में सरकारी नौकरी से त्यागपत्र देकर वह अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में कूद पड़े थे। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद पिता के नक्शे-कदम पर चलते हुए 1952 में वह हसनपुर विधानसभा सीट से विधायक रहे थे। 1975 में इमरजेंसी के बाद एक बार फिर से उन्होंने सरकार के खिलाफ आंदोलन छेड़ा और 1977 में भारतीय लोकदल से सांसद चुने गए थे। उनके पिता भी स्वतंत्रता सेनानी रहे थे और 1946 में पंजाब-हरियाणा प्रदेश से विधायक रहे थे।
गांव सीही निवासी धर्मवीर वशिष्ठ के बड़े बेटे सत्यवीर वशिष्ठ ने बताया कि पिता धर्मवीर आबकारी विभाग में कार्यरत थे। वर्ष 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में अपना सहयोग देने के लिए उनके पिता धर्मवीर वशिष्ठ ने सरकारी नौकरी छोड़ दी थी। इस दौरान देश को आजाद कराने के लिए अंग्रेजों की लाठियां खाईं और जेल भी गए। स्वतंत्रता प्राप्त होने के बाद 1952 में बनी पंजाब और हरियाणा प्रदेश की पहली विधानसभा में हसनपुर से खड़े हुए और जनता ने उनको चुनकर विधानसभा भेजा। उस वक्त हसनपुर सीट हसनपुर क्षेत्र से लेकर बदरपुर बॉर्डर तक एक ही विधानसभा हुआ करती थी। उस समय धर्मवीर वशिष्ठ कांग्रेस पार्टी से हसनपुर से विधानसभा सीट पर खड़े और जीत हासिल की।
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इंदिरा गांधी की नीतियों का खुलकर विरोध किया था
स्वभाव से शांत और बेहद प्रखर वक्ता धर्मवीर वशिष्ठ ने उस दौरान प्रधानमंत्री रहीं इंदिरा गांधी की नीतियों का खुलकर विरोध किया था। वह चौधरी चरण सिंह के साथ आंदोलन से जुड़ गए थे। 22 माह बाद 1977 में जब परिसीमन के बाद फरीदाबाद सीट का गठन हुआ, तो फरीदाबाद के पहले और देश के छठे लोकसभा चुनावों के दौरान वह कांग्रेस के खिलाफ मैदान में उतर पड़े। इस दौरान फरीदाबाद सीट से सात उम्मीदवारों ने सांसद का चुनाव लड़ा था। इसी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के खिलाफ लोगों में इतनी नाराजगी थी कि इस सीट पर 70.81 प्रतिशत बंपर वोटिंग हुई। भारतीय लोकदल धर्मवीर वशिष्ठ ने 63 वर्ष की उम्र में सांसद का चुनाव लड़ा था। उनको 44.30 प्रतिशत, निर्दलीय खुर्शीद अहमद को 37.75, कांग्रेस के तैयब हुसैन को 13.91 प्रतिशत वोट मिले। भारतीय लोक पार्टी के उम्मीदवार धर्मवीर वशिष्ठ इस चुनाव को जीतकर फरीदाबाद से पहले सांसद बने थे। उन्होंने एक लाख 84 हजार 948 वोट हासिल किए थे। उन्होंने वर्ष 1980 में दोबारा जनता पार्टी से चुनाव लड़ा। उस समय उनको लोगों का प्यार नहीं मिलने की वजह से वह तीसरे नंबर पर रहे। उनको 26.5 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए थे। उसके बाद उन्होंने राजनीति से नाता छोड़ दिया। साल 1990 में उनकी मृत्यु हो गई।
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कार्यक्रम के दौरान ही धर्मवीर का नाम किया घोषित
साल 1977 में पलवल में एक समारोह का आयोजन किया गया था, जिसमें मंच पर पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह ने अचानक से गांव सीही निवासी धर्मवीर वशिष्ठ का नाम घोषित कर दिया। उस समय जो लहर चल रही थी उससे यही अंदाजा लगाया जा रहा था कि खुर्शीद अहमद को उम्मीदवार घोषित किया जाएगा। अचानक क्षेत्रीय समीकरण की जानकारी होते ही चौधरी चरण सिंह ने बिना किसी से कोई विचार विमर्श किए समारोह के दौरान ही लोगों के सामने धर्मवीर वशिष्ठ का नाम घोषित कर दिया था।
बेटे ने भी कॉलेज में बनाया चुनावी कार्यालय
धर्मवीर वशिष्ठ के बड़े बेटे सत्यवीर वशिष्ठ ने बताया कि जिस समय उनके पिता का नाम सांसद पद के लिए घोषित किया गया, उस समय सत्यवीर वाईएमसीए कॉलेज से इंजीनियर की पढ़ाई कर रहे थे। आपातकाल लागू होने की वजह से कॉलेज की ओर से कोई रोक टोक नहीं थी। उन्होंने हॉस्टल के एक कमरे में पिता के प्रचार प्रसार के लिए कार्यालय खोल दिया। पढ़ाई के बाद वह अपने पिता के साथ जगह जगह जाकर प्रचार करते थे। उस समय वह कॉलेज की यूनियन में उपप्रधान के पद पर कार्यरत थे।
जब अंग्रेजों के सामने नहीं डिगे तो और किसी से क्या डरेंगे
छोटे बेटे संतवीर
ने बताया कि 25 जून 1975 से लगा आपातकाल लगभग 21 माह तक चला। उस दौरान लोगों ने उनके पिता धर्मवीर से भूमिगत होने के लिए कहा। उन्होंने जवाब दिया कि जब अंग्रेजों के सामने वह नहीं डिगे तो और किसी से क्या डरेंगे। उन्होंने लोगों की बात नहीं सुनी और प्रचार करते हुए लोगों के बीच रहे। अंत में चुनाव का नतीजा जीत के रूप में सामने आया।