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कोरोना से सूजी दिमाग की नसें, अपाहिज होने से बची
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फरीदाबाद। 14 वर्षीय एक लड़की को दौरे पड़ने की वजह से अस्पताल में भर्ती कराया गया। रिपोर्ट में पता चला कि उसकी दिमाग की नसें सूज गई हैं। इसके बाद एंटी बॉडी जांच की गई। उसमें बच्ची के कोरोना की चपेट में आने का पता चला। डाक्टर ने बताया कि समय पर इलाज नहीं मिलता तो बच्ची जिंदगी भर के लिए अपाहिज हो सकती थी। वह कभी भी बैठ नहीं पाती, चल नहीं पाती, खा नहीं पाती। तीन माह बाद वह 80 फीसदी तक स्वस्थ है।
गांव बड़ौली निवासी अंजली (14) सिर दर्द की शिकायत और दौरों के कारण 17 दिसंबर को अस्पताल आई थी। जांच के दौरान शरीर में एंटी बॉडी मिलने से पता चला कि वह कोरोना पीड़ित थी। परिवार या बच्ची को इसकी जानकारी नहीं थी। पिता नरेश कुमार ने बताया कि बेटी को सिर दर्द था। फिर दौरे पड़े। वह भूत-प्रेत का चक्कर समझ बाबा के पास ले गए। आराम नहीं हुआ तो स्थानीय डॉक्टर से जांच कराई। वहां डॉक्टर ने बड़े अस्पताल में जाने की सलाह दी।
अंजलि का इलाज करने वाले एशियन अस्पताल के पीआईसीयू इंचार्ज डॉ. हरिपाल कश्यप ने बताया कि वह सांस लेने, चलने-बोलने में दिक्कत महसूस कर रही थी। जांच में पता चला कि उसके दिमाग की नसें सूज कर गल गई हैं। दिमाग शरीर पर नियंत्रण खो रहा था। वह मल्टी सिस्टम इंफलामेंट्री सिंड्रोम (एमआईएस-सी) से जूझ रही थी। किशोरी 13 दिन आईसीयू में रही। लगातार तीन माह इलाज चला। इसके बाद वह करीब 80 फीसदी तक स्वस्थ है।
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डॉ. हरिपाल ने बताया कि कई बच्चों में यह समस्या देखने को मिली है। ऐसे में अभिभावक दौरे की समस्या को हल्के में न लें। परेशानी होने पर तुरंत ऐसे अस्पताल में दिखाएं जहां आईसीयू की सुविधा उपलब्ध हो।
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गांव बड़ौली निवासी अंजली (14) सिर दर्द की शिकायत और दौरों के कारण 17 दिसंबर को अस्पताल आई थी। जांच के दौरान शरीर में एंटी बॉडी मिलने से पता चला कि वह कोरोना पीड़ित थी। परिवार या बच्ची को इसकी जानकारी नहीं थी। पिता नरेश कुमार ने बताया कि बेटी को सिर दर्द था। फिर दौरे पड़े। वह भूत-प्रेत का चक्कर समझ बाबा के पास ले गए। आराम नहीं हुआ तो स्थानीय डॉक्टर से जांच कराई। वहां डॉक्टर ने बड़े अस्पताल में जाने की सलाह दी।
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अंजलि का इलाज करने वाले एशियन अस्पताल के पीआईसीयू इंचार्ज डॉ. हरिपाल कश्यप ने बताया कि वह सांस लेने, चलने-बोलने में दिक्कत महसूस कर रही थी। जांच में पता चला कि उसके दिमाग की नसें सूज कर गल गई हैं। दिमाग शरीर पर नियंत्रण खो रहा था। वह मल्टी सिस्टम इंफलामेंट्री सिंड्रोम (एमआईएस-सी) से जूझ रही थी। किशोरी 13 दिन आईसीयू में रही। लगातार तीन माह इलाज चला। इसके बाद वह करीब 80 फीसदी तक स्वस्थ है।
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डॉ. हरिपाल ने बताया कि कई बच्चों में यह समस्या देखने को मिली है। ऐसे में अभिभावक दौरे की समस्या को हल्के में न लें। परेशानी होने पर तुरंत ऐसे अस्पताल में दिखाएं जहां आईसीयू की सुविधा उपलब्ध हो।