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डूसू चुनाव: आंदोलन की नई भाषा और पुरानी सियासत साथ, जंतर-मंतर के 'शक्ति-प्रदर्शन' से डीयू मतदान केंद्र तक

Sat, 19 Sep 2026 05:49 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Sat, 19 Sep 2026 05:49 AM IST
सार

शुक्रवार को मतदान के लिए पहुंचे छात्रों की बातचीत में सुरक्षा, हॉस्टल, फीस, परिवहन और जवाबदेही जैसे कैंपस से जुड़े मुद्दे प्रमुख रहे। हालांकि, इन सवालों के साथ उनकी पारंपरिक छात्र राजनीति से दूरी भी पूरी तरह दिखाई नहीं दी।

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DUSU Elections: A New Language of Agitation and Old-Style Politics Coexist
कल हुआ मतदान... - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

जंतर-मंतर पर हाल में दिखी जेन-जेड की ऊर्जा की पहली संस्थागत परीक्षा के तौर पर दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (डूसू) चुनाव को देखा जा रहा है। शुक्रवार को मतदान के लिए पहुंचे छात्रों की बातचीत में सुरक्षा, हॉस्टल, फीस, परिवहन और जवाबदेही जैसे कैंपस से जुड़े मुद्दे प्रमुख रहे। हालांकि, इन सवालों के साथ उनकी पारंपरिक छात्र राजनीति से दूरी भी पूरी तरह दिखाई नहीं दी। मतदान केंद्रों पर छात्रों की प्राथमिकताओं में बदलाव के संकेत मिले, लेकिन संगठनात्मक राजनीति की मौजूदगी भी उतनी ही स्पष्ट रही।

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डूसू चुनाव से ठीक पहले दिल्ली में जेन-जी का आंदोलन सामने आया था। जंतर-मंतर पर इस पीढ़ी ने पारंपरिक राजनीतिक तौर-तरीकों से अलग अपनी आवाज दर्ज कराई। अब वही पीढ़ी विश्वविद्यालय की चुनावी प्रक्रिया में मतदाता के तौर पर सामने है। इसलिए सवाल केवल यह नहीं है कि युवा राजनीति में रुचि रखते हैं या नहीं, बल्कि यह भी है कि उनकी नई तरह की राजनीतिक सक्रियता कैंपस में दशकों से मौजूद छात्र संगठनों की चुनावी शैली को किस हद तक प्रभावित करती है।
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दिल्ली विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर चंद्रचूड़ सिंह के मुताबिक, जेन-जेड आंदोलन का असर डूसू चुनाव पर पड़ना स्वाभाविक है, लेकिन उसका स्वरूप और दायरा चुनाव परिणाम से ही स्पष्ट होगा। उनके मुताबिक, इसका लाभ किस संगठन को मिलेगा, यह अभी तय तौर पर कहना संभव नहीं है। साथ ही, एबीवीपी और एनएसयूआई की पारंपरिक कैंपस राजनीति को इससे तत्काल बड़ी चुनौती मिलने की संभावना को भी वे खारिज करते हैं। मतदान के दौरान छात्रों की प्रतिक्रियाओं से हालांकि इतना जरूर नजर आया कि वे अपने रोजमर्रा के हितों और विश्वविद्यालय में मिलने वाली सुविधाओं को लेकर सजग हैं।
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मिनी भारत में पुरानी राजनीतिक धुरी
करीब 1.50 लाख मतदाताओं वाला डूसू चुनाव केवल विश्वविद्यालय का छात्र चुनाव नहीं है। देश के अलग-अलग हिस्सों से आए छात्र इसमें शामिल होते हैं। जम्मू-कश्मीर से कन्याकुमारी और गुजरात से पूर्वोत्तर तक की विविधता इसे ‘मिनी भारत’ की राजनीतिक तस्वीर देती है। भाषा, क्षेत्र और सामाजिक पृष्ठभूमि की इस विविधता के बीच भी डूसू की चुनावी राजनीति लंबे समय से दो प्रमुख छात्र संगठनों के इर्द-गिर्द केंद्रित रही है।

भाजपा से वैचारिक रूप से जुड़े एबीवीपी और कांग्रेस से जुड़े एनएसयूआई के बीच मुकाबला इसका प्रमुख हिस्सा रहा है। इस बार भी मतदान के बाद चुनावी तस्वीर में इन्हीं दोनों संगठनों की मौजूदगी प्रमुख रही। ऐसे में जेन-जेड की नई राजनीतिक सक्रियता ने मौजूदा ढांचे को खत्म करने के बजाय उसके भीतर नए सवाल जरूर जोड़े हैं।

डिजिटल पहुंच, जमीन पर संगठन
इस चुनाव में बदलाव का एक महत्वपूर्ण पहलू प्रचार और संवाद का तरीका है। सोशल मीडिया ने उम्मीदवारों और छात्र संगठनों को छात्रों तक पहुंचने के नए माध्यम दिए हैं। लेकिन मतदान के दिन कॉलेजों में संगठन की मौजूदगी, समर्थकों की सक्रियता और बूथ स्तर की लामबंदी की भूमिका बनी रही। यही डूसू चुनाव का मौजूदा संक्रमण है।


छात्रों की राजनीतिक भाषा बदल रही है। वे अधिकार, सुविधाओं और जवाबदेही को अधिक सीधे ढंग से उठा रहे हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उनका संगठनों से रिश्ता टूट गया है। नई पीढ़ी के मुद्दे और पुरानी चुनावी व्यवस्था फिलहाल एक-दूसरे के समानांतर चल रहे हैं। डूसू चुनाव इसी बदलाव को दर्ज करता दिखाई दे रहा है-जहां आंदोलन की नई भाषा कैंपस तक पहुंच चुकी है, लेकिन चुनाव की पुरानी मशीनरी अभी भी अपनी जगह कायम है।

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