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डीयू के प्रोफेसर ने ढूंढ़ निकाले 7 गोल्डन मेढ़क

Fri, 31 Oct 2014 09:33 AM IST
Updated Fri, 31 Oct 2014 09:33 AM IST
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DU professor discovers 7 frog species

देश के फ्रॉगमैन कहे जाने वाले दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एसडी बिजू ने एक और बड़ी सफलता हासिल की है। प्रो. बिजू और उनकी टीम ने श्रीलंका ग्लोबल बायोडायवर्सिटी हॉटस्पॉट के पश्चिमी घाटों से सुनहरी पीठ (गोल्डन बैक) वाले मेढ़कों की सात प्रजातियां ढूंढ निकाली हैं।

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इस खोज के साथ ही बिजू ने मेढ़कों की इस प्रजाति के बारे में फैली गलत धारणाओं और मान्यताओं से भी पर्दा उठा दिया है। इसके साथ ही वह सदी के शीर्ष तीन बड़े खोजकर्ताओं की सूची में भी शामिल हो गए हैं।
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अब तक यह माना जा रहा था कि भारत और श्रीलंका में पाए जाने वाले से 'सुनहरे मेढ़क' एक ही प्रजाति के हैं। लेकिन एकीकृत तरीके से की गई इस रिसर्च में टीम ने यह पाया गया है कि भारत और श्रीलंका में पाए जाने वाले ये मेढ़क अलग-अलग प्रजाति के हैं। इस खोज के साथ ही मेढ़कों की प्रजाति तय हो गई है।
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अब तक मिली थी आधी अधूरी जानकारी

DU professor discovers 7 frog species

जानकारों के मुताबिक, इस खोज ने उभयचर व्यवस्था को लेकर वर्षों से चली आ रही समस्याओं का भी समाधान कर दिया है। बेल्जियम की व्रिजे यूनिवर्सिटिएट ब्रूसेल्स में एम्फ‌िबियन एवोल्यूशन लैब के फ्रैंकी बोस्यूट ने बताया कि इससे पहले श्रीलंका के पश्चिमी घाटों में पाए जाने वाले इन मेढ़कों के बारे में गहराई से कोई खोज नहीं की गई है।

अब महज कुछ प्रजातियों के बारे में ही लोगों को जानकारी थी, उसमें भी भारतीय औ श्रीलंकाई मेढ़कों के बारे में अलग-अलग जानकारी का भी अभाव था। प्रो. बिजू और उनकी टीम में रूपात्मक (morphological) और आनुवांशिक (genetic) अध्ययन के जरिए वर्षों से चली आ रही इस आधी अधूरी जानकारी व समस्या का समाधान कर दिया है।

इस अध्ययन से यह भी साफ हो गया कि मुख्यभूमि और द्वीप में अलग तरह के जीव होते ‌हैं और दोनों को संरक्षित किया जाना चाहिए।

श्रीलंकाई मेढ़कों से बिल्कुल अलग हैं ये

DU professor discovers 7 frog species

जर्मन-ब्रिटिश जीव विज्ञानी एल्बर्ट गुंथेर ने सबसे पहले श्रीलंका के पश्चिमी घाटों में पाए जाने वाले सुनहरे मेढ़कों की प्रजाति के बारे में बताया था। सुनहरी पीठ वाले मेढ़क हाइलराना टेम्पोरलिस को सबसे पहले श्रीलंका में 1864 में देखा गया था।

धीरे-धीरे इन्हें श्रीलंका ग्लोबल बायोडायवर्सिटी हॉटस्पॉट के पश्चिमी घाटों में देखे जाने के साथ ही इन्हें भारत में भी देखा जाने लगा। दक्षिण भारत के साथ ही ये सबसे ज्यादा महाराष्ट्र में पाए जाते हैं। ये सभी प्रजातियां अब तक कॉमन समझी जा रही थीं।

प्रो. बिजू ने बताया कि डीएनए और रुपात्मक अध्ययन के बाद यह पाया गया कि करीब 150 वर्षों तक भारत में इन मेढ़कों की प्रजाति की गलत पहचान हो रही थी। खोज में यह खुलासा हुआ है कि भारत में पाए जाने वाले इन मेढ़कों की प्रजाति श्रीलंकाई मेढ़कों से बिल्कुल अलग है।

उठाना पड़ता है खतरा!

DU professor discovers 7 frog species

यह भी माना जा रहा है कि भारत में पाए जाने वाले मेढ़कों की और भी कई नई प्रजातियां सामने आई हैं। इसके भारत में उत्पन्न होने की अवधारणा भी गलत साबित हुई है।

प्रो. बिजू ने बताया कि अक्सर वैज्ञानिक उभयचर जीवों का पता लगाने के लिए प्राकृतिक जंगलों में ही जाते थे। जबकि सुनहरे मेढ़क शहरी आबादी वाले इलाकों में पाए जाते हैं।

शहरी आबादी में पाए जाने वाले ये मेढ़क हमारे घरों के आसपास भी पाए जा सकते हैं। इन मेढ़कों को मानव गतिविधियों से निकटता के कारण कई बार खतरों से भी जूझना पड़ता है। बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी के निदेशक असद रहमनी ने बताया कि प्रो. बिजू की खोज ने यह दर्शाया है कि हम लोग अपने पर्यावरण और आसपास की चीजों से कितने अनजान हैं।

साभार: टाइम्स ऑफ इंडिया

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