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दिल्ली: निजी अस्पतालों की मनमानी रोकने वाला ड्राफ्ट अधर में, स्वास्थ्य मंत्री से नहीं मिली मंजूरी

Thu, 04 Oct 2018 06:28 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Thu, 04 Oct 2018 06:28 AM IST
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Draft for control Arbitrariness of private hospitals are pending, health minister not get permission

निजी अस्पतालों की मनमानी पर पिछले एक वर्ष से दिल्ली सरकार लगाम कसने में सफल नहीं हो पा रही है। सरकार ने नौ सदस्यीय कमेटी के जरिए एक ड्राफ्ट तैयार कर इन अस्पतालों को घेरने के लिए सख्त नियम भी बनाए। इसे आपत्ति एवं सुझाव के लिए स्वास्थ्य विभाग ने अपनी वेबसाइट पर भी अपलोड किया, लेकिन अभी तक आगे की प्रक्रिया के बारे में कोई जानकारी नहीं है। स्वास्थ्य सेवाओं के महानिदेशक डॉ. कीर्तिभूषण की मानें तो ड्राफ्ट संशोधन के बाद सरकार के पास भेजा गया है।

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सूत्रों की मानें तो निजी अस्पतालों ने दिल्ली सरकार के उस सुझाव को ठुकरा दिया है, जिसमें कहा गया था कि यदि मरीज की मौत भर्ती होने के 6 घंटे के भीतर होती है तो उसका 50 प्रतिशत बिल माफ कर दिया जाए। इसके साथ ही उन्होंने स्वास्थ्य विभाग द्वारा सुझाए गए हाई रिस्क पैकेज पर भी असहमति जताते हुए इसे अपनाने से इंकार कर दिया है।
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दरअसल, नवंबर 2017 में शालीमार बाग स्थित मैक्स अस्पताल में नवजात शिशु की मौत का मामला काफी सुर्खियों में रहा था। इसे लेकर दिल्ली सरकार ने नौ सदस्यीय कमेटी बनाई थी, जिसकी सिफारिशों के बाद 28 मई को स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन ने कहा था कि, उन्होंने प्राइवेट अस्पतालों पर नकेल कसने के लिए एक ड्राफ्ट तैयार किया है। इसमें दवाओं की लिस्ट से लेकर बिल माफी तक की बातें कही गई थी, लेकिन 5 महीने बीत जाने के बाद भी प्राइवेट अस्पतालों ने इसे अपनाने से साफ इंकार कर दिया है।

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डॉ. भूषण के अनुसार प्राइवेट अस्पतालों का कहना है कि जब मरीज अस्पताल में भर्ती होता है तो उसकी हालत काफी क्रिटिकल होती है। इस दौरान उसका आईसीयू, ऑपरेशन, महंगी दवाओं से इलाज किया जाता है। इसके बावजूद यदि मरीज की मौत हो जाती है और हम उसका 50 प्रतिशत बिल माफ कर देते हैं तो अस्पताल का खर्चा कहां से निकलेगा। शुरुआत के 6 घंटों में ही मरीज पर सबसे ज्यादा खर्चा होता है, ऐसे में हम बिल माफ करने में सक्षम नहीं हैं।

स्वास्थ्य मंत्री ने ड्राफ्ट में हाई रिस्क पैकेज को भी शामिल किया था। इस पैकेज के तहत यदि किसी मरीज के इलाज का पैकेज एक लाख रुपये है, लेकिन बाद में पता चलता है कि उसे पैकेज से बाहर इलाज की जरूरत है, जिसका खर्चा पहले पैकेज के बराबर या फिर उससे ज्यादा है तो इस स्थिति में अस्पताल मरीज से पहले पैकेज का केवल 20 या 30 प्रतिशत ही लेंगे और उसी में मरीज का पूरा इलाज करेंगे। इस पर भी प्राइवेट अस्पतालों ने असहमति जताते हुए अपनाने से इंकार कर दिया। 

डॉ. कीर्ति भूषण का कहना है कि इसके पीछे प्राइवेट अस्पतालों ने यह तर्क दिया था कि शुरुआत में यह नहीं कहा जा सकता कि मरीज को किस पैकेज की जरूरत है। यदि कोशिश के बाद यह पता चल भी जाता है कि मरीज का इलाज एक लाख के पैकेज में हो जाएगा, लेकिन बाद में यदि स्थिति बिगड़ने पर दो लाख के पैकेज की जरूरत पड़ती है तो केवल 20 से 30 प्रतिशत और रुपये लेने से इलाज संभव नहीं हो सकता क्योंकि दवाओं पर ही बहुत पैसा खर्च हो जाता है।

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