दांतों के डॉक्टर अब डेंटल सर्जरी में करेंगे इस गैस का इस्तेमाल, पहले नहीं थी गाईडलाईन
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नाइट्रस ऑक्साइड (लॉफिंग गैस) का इस्तेमाल अब दांतों के इलाज में डॉक्टर कर सकेंगे। अभी तक इसकी अनुमति न होने की वजह से ज्यादातर डॉक्टर डेंटल चेयर पर इस्तेमाल से कतराते थे, लेकिन भारतीय दंत चिकित्सा परिषद (डीसीआई) ने एक ड्राफ्ट तैयार किया है, जिसे केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय से अंतिम मंजूरी मिलने के बाद इसे लागू किया जा सकेगा।
आमतौर पर नाइट्रस ऑक्साइड का इस्तेमाल डॉक्टर स्पेशल बच्चों के इलाज के लिए करते हैं।
कई बार छोटे बच्चों के लिए भी डॉक्टर को इसका इस्तेमाल करना पड़ता है, ताकि बच्चा डेंटल चेयर पर आराम से टिक सके। चूंकि इस गैस के इस्तेमाल के लिए अब तक कोई नियम नहीं था, इसलिए ज्यादातर डॉक्टर गैस के इस्तेमाल से कतराते थे, लेकिन अब डीसीआई का कहना है कि जल्द ही डॉक्टरों की परेशानी दूर होगी।
डीसीआई के सचिव डॉ. सव्यसाची साहा ने बताया कि गाइडलाइन न होने की वजह से डॉक्टरों को इसे प्रमाणित तकनीक के तौर पर प्रस्तुत करने में दिक्कत होती थी, इसलिए वे इसका इस्तेमाल करने से भी कतराते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं होगा।
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..इसलिए जरूरत पड़ती है गैस की
डीसीआई के सचिव डॉ. साहा ने बताया कि स्पेशल बच्चे दांतों की सर्जरी के दौरान डेंटिस्ट के निर्देशों का पालन नहीं करते हैं, जबकि इसकी वजह से डॉक्टरों को सर्जरी में परेशानी होती है। स्थिति ऐसी है कि एनेस्थीसिया देकर बच्चे को बेहोश भी नहीं किया जा सकता, इसलिए नाइट्रस ऑक्साइड की कुछ मात्रा इस्तेमाल करनी पड़ती है।
डॉक्टरों को मिलेगी ट्रेनिंग
पिछले सप्ताह की परिषद बैठक में डीसीआई ने जहां गाइडलाइन बनाने का फैसला लिया। वहीं नाइट्रस ऑक्साइड के इस्तेमाल के लिए डॉक्टरों को ट्रेनिंग देने का निर्णय भी लिया, ताकि डॉक्टर बच्चे की उम्र और स्वास्थ्य स्थितियों के अनुसार आसानी से इसकी डोज तय कर सके। डॉ. साहा के अनुसार, इस एक सप्ताह की अवधि वाले कोर्स की शुरुआत दिल्ली स्थित मौलाना आजाद दंत चिकित्सालय, चंडीगढ़ पीजीआई, कटक और महाराष्ट्र के कुछ मेडिकल कॉलेजों में होगी।
पढ़ाई में शामिल होगी ट्रेनिंग
बताया जा रहा है कि कुछ समय बाद डीसीआई बीडीएस कोर्स के साथ ही इस ट्रेनिंग को जोड़ने वाली है, ताकि पढ़ाई के दौरान ही चिकित्सीय विद्यार्थियों को इस गैस के इस्तेमाल के बारे में पर्याप्त जानकारी हो। इसके लिए फिलहाल प्रक्रिया शुरू होने वाली है।