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उपनिषदों की विदुषी डॉ. वेदवती वैदिक का निधन
Thu, 04 Apr 2019 04:33 PM IST
पूजा त्रिपाठी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: पूजा त्रिपाठी
Updated Thu, 04 Apr 2019 04:33 PM IST
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डॉक्टर वेदवती वैदिक
- फोटो : अमर उजाला
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उपनिषदों की विख्यात विदुषी प्रो. वेदवती वैदिक का आज निधन हो गया है। दिल्ली के लीवर इंस्टीट्यूट में उनका उपचार चल रहा था। वो प्रसिद्ध पत्रकार डॉ. वेदप्रताप वैदिक की धर्मपत्नी थीं। उनकी आयु 70 वर्ष थी।
उनका अंतिम संस्कार दयानंद घाट, लोदी इस्टेट पर आज संपन्न हुआ। 1977 से दिल्ली विश्वविद्यालय के मैत्रेयी महाविद्यालय में अध्यापन तथा श्री अरविंद महाविद्यालय (सांध्य) में संस्कृत विभागाध्यक्ष रहीं। प्रो. वेदवती ने 1986 से दिल्ली विश्वविद्यालय के दक्षिण परिसर में एम.ए. और एम.फिल. कक्षाओं में प्राध्यापन एवं शोध निर्देशन किया है।
वे ‘इंण्डियन काउंसिल ऑफ हिस्टोरिकल रिसर्च’ की सीनियर फेलो (1980-83) रहीं। 2013 में वे सेवानिवृत्त हुईं। उन्होंने साउथ एक्सटेंशन, दिल्ली के 'रामेश्वरदास गुप्त धर्मार्थ ट्रस्ट' के प्रबंध न्यासी के तौर पर समाजसेवा के अनेक अभियान चलाए।
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उपनिषद-विद्या और वेदवती वैदिक एक-दूसरे के पर्याय बन गए। दिल्ली विश्वविद्यालय से संस्कृत में बी.ए. (ऑनर्स) और एम.ए. करने के पश्चात् उन्होंने 'श्वेताश्वतर उपनिषद के भाष्यों का एक अध्ययन’ विषय पर 1977 में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की।
उपनिषद विद्या पर उनके ये ग्रंथ प्रकाशित हुए हैं- ‘श्वेताश्वतर उपनिषदः दार्शनिक अध्ययन’, ‘उपनिषदों के ऋषि’, ‘उपनिषद वाड्मयः विविध आयाम’, ‘उपनिषदों के निर्वचन’ और ‘उपनिषद्युगीन संस्कृति’। उन्होंने भगवद्गीता का हिंदी और अंग्रेजी अनुवाद किया है।
इस ग्रंथ के अनेक संस्करण हो चुके हैं। उनका 1500 पृष्ठों का उपनिषद महाकोश ( एनसाइक्लोपीडिया ऑफ उपनिषद्स ) हिंदी और अंग्रेजी में शीघ्र प्रकाशित होने वाले हैं। वे 'निःश्रेयस न्यास' द्वारा प्रकाशित ‘त्वदीयम्’ एवं ‘आधुनिक भारतीय विचारक’ नामक दो ग्रंथों की संपादक रही हैं।
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उनका अंतिम संस्कार दयानंद घाट, लोदी इस्टेट पर आज संपन्न हुआ। 1977 से दिल्ली विश्वविद्यालय के मैत्रेयी महाविद्यालय में अध्यापन तथा श्री अरविंद महाविद्यालय (सांध्य) में संस्कृत विभागाध्यक्ष रहीं। प्रो. वेदवती ने 1986 से दिल्ली विश्वविद्यालय के दक्षिण परिसर में एम.ए. और एम.फिल. कक्षाओं में प्राध्यापन एवं शोध निर्देशन किया है।
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वे ‘इंण्डियन काउंसिल ऑफ हिस्टोरिकल रिसर्च’ की सीनियर फेलो (1980-83) रहीं। 2013 में वे सेवानिवृत्त हुईं। उन्होंने साउथ एक्सटेंशन, दिल्ली के 'रामेश्वरदास गुप्त धर्मार्थ ट्रस्ट' के प्रबंध न्यासी के तौर पर समाजसेवा के अनेक अभियान चलाए।
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उपनिषद-विद्या और वेदवती वैदिक एक-दूसरे के पर्याय बन गए। दिल्ली विश्वविद्यालय से संस्कृत में बी.ए. (ऑनर्स) और एम.ए. करने के पश्चात् उन्होंने 'श्वेताश्वतर उपनिषद के भाष्यों का एक अध्ययन’ विषय पर 1977 में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की।
उपनिषद विद्या पर उनके ये ग्रंथ प्रकाशित हुए हैं- ‘श्वेताश्वतर उपनिषदः दार्शनिक अध्ययन’, ‘उपनिषदों के ऋषि’, ‘उपनिषद वाड्मयः विविध आयाम’, ‘उपनिषदों के निर्वचन’ और ‘उपनिषद्युगीन संस्कृति’। उन्होंने भगवद्गीता का हिंदी और अंग्रेजी अनुवाद किया है।
इस ग्रंथ के अनेक संस्करण हो चुके हैं। उनका 1500 पृष्ठों का उपनिषद महाकोश ( एनसाइक्लोपीडिया ऑफ उपनिषद्स ) हिंदी और अंग्रेजी में शीघ्र प्रकाशित होने वाले हैं। वे 'निःश्रेयस न्यास' द्वारा प्रकाशित ‘त्वदीयम्’ एवं ‘आधुनिक भारतीय विचारक’ नामक दो ग्रंथों की संपादक रही हैं।