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लाइब्रेरी में कथित घायल छात्र के लिए मांगा दो करोड़ मुआवजा, रिट याचिका दायर पर हाईकोर्ट नाराज

Tue, 18 Feb 2020 12:06 AM IST
Vikas Kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Vikas Kumar Updated Tue, 18 Feb 2020 12:06 AM IST
सार

दिल्ली हाईकोर्ट ने 15 दिसंबर को जामिया मिल्लिया इस्लामिया की लाइब्रेरी में पुलिस की कथित क्रूरता को लेकर सोमवार को दिल्ली पुलिस और केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया। इस घटना में कथित घायल छात्र के लिए दो करोड़ रुपये मुआवजा दिलाने की मांग की गई है।

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demand two crore rupees compensation for injured student in jamia library
जामिया हिंसा - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

दिल्ली हाईकोर्ट ने 15 दिसंबर को जामिया मिल्लिया इस्लामिया की लाइब्रेरी में पुलिस की कथित क्रूरता को लेकर सोमवार को दिल्ली पुलिस और केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया। इस घटना में कथित घायल छात्र के लिए दो करोड़ रुपये मुआवजा दिलाने की मांग की गई है। इस मामले में अगली सुनवाई 27 मई को मुकर्रर की गई है।

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मुख्य न्यायाधीश डीएन पटेल और न्यायमूर्ति हरिशंकर की खंडपीठ ने याचिका पर सुनवाई के बाद संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी किया। पीठ ने इस मामले को रिट याचिका के जरिए पेश किए जाने पर चिंता व्यक्त की। यह याचिका नबीला हसन की ओर से दायर की गई है। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता छात्र मुजीब के दोनों पैर खराब हो गए हैं। उसे गंभीर चोटें आई हैं, जिनके इलाज में ढाई लाख रुपये खर्च हो चुके हैं। उन्होंने हाल ही में इंटरनेट पर सामने आई सीसीटीवी फुटेज का हवाला देते हुए कहा कि यह लाइब्रेरी के अंदर पुलिस की बर्बरता का स्पष्ट उदाहरण है। उन्होंने याचिका के समर्थन में छात्र का इलाज कर रहे डॉक्टर की डिस्चार्ज रिपोर्ट भी पेश की। नबीला हसन ने दावा किया कि रिपोर्ट मुआवजे के उनके दावे की पुष्टि करती है।
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नबीला ने अपनी दलील में कहा कि छात्रों की शिकायत पर पुलिस ने एफआईआर तक दर्ज नहीं की। इसी प्रकार के पिछले मामले में कोर्ट दूसरे पक्ष को नोटिस जारी कर चुकी है। इसलिए उन्होंने मौजूदा मामले में कोर्ट से हस्तक्षेप की मांग की। उन्होंने घायल छात्र को अंतरिम मुआवजा दिलाने की भी मांग की। अदालत ने हालांकि इस मांग को ठुकरा दिया। कोर्ट ने कहा कि तथ्यों और सबूतों का मूल्यांकन किए बिना मुआवजे की गणना कैसे की जा सकती है। अदालत ने याचिकाकर्ता से कहा कि मामले में कोई प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई है तो वह आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 156 (3) के तहत मजिस्ट्रेट के पास जा सकती थीं।
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रिट याचिका दायर करने पर अदालत नाराज
कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका के जरिए ऐसे मामले को उठाने पर नाराजगी जाहिर की। कोर्ट ने कहा कि आप इस प्रार्थना के लिए मुकदमा क्यों दायर नहीं करतीं? इस मामले में सबूतों की जांच की आवश्यकता है। हम केवल याचिका में पेश अनुलग्नकों पर भरोसा नहीं कर सकते। 


केंद्र सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता अमित महाजन ने याचिका में दिए गए तथ्यात्मक दावों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि हर चीज के लिए रिट याचिका दायर करना दिल्ली में एक फैशन बन गया है। ऐसा नहीं है कि हमारे पास अनुच्छेद 226 के तहत शक्तियां नहीं हैं, लेकिन ऐसी असाधारण शक्तियों का सावधानीपूर्वक उपयोग करने की आवश्यकता है।

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