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दिल्ली दंगा केस: पिंजरा तोड़ एक्टिविस्ट देवांगना-नताशा और जामिया छात्र आसिफ को मिली जमानत

Tue, 15 Jun 2021 11:28 AM IST
पूजा त्रिपाठी अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: पूजा त्रिपाठी Updated Tue, 15 Jun 2021 11:28 AM IST
सार

साल 2020 में उत्तर पूर्वी दिल्ली में हुए दंगा मामले में यूएपीए की धाराओं में गिरफ्तार पिंजरा तोड़ कार्यकर्ता देवांगना कलीता, नताशा नरवाल और जामिया के छात्र आसिफ इकबाल को दिल्ली हाईकोर्ट ने मंगलवार को जमानत दे दी है।

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Delhi riots 2020 Delhi High Court grants bail to Pinjra Tod activists Devangana Kalita and Natasha Narwal and Jamia student Asif Iqbal Tanha
देवांगना कलीता और नताशा नरवाल - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

हाईकोर्ट ने नरवाल व कलिता के विषय में कहा कि उनकी शैक्षिक पृष्ठभूमि, प्रोफाइल व पोजीशन को देखते हुए ऐसी आशंका का कोई कारण नहीं है कि वे देश छोड़कर चली जाएंगी, साक्ष्यों को नष्ट करेंगी या किसी गवाह को धमकाएंगी या किसी भी तरह मुकदमे की सुनवाई को प्रभावित करेंगी।

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खंडपीठ ने नरवाल के बारे में कहा कि जब उत्तर पूर्वी दिल्ली के कई इलाकों में हिंसा और दंगे हो रहे थे तब सीएए व एनआरसी के विरोध प्रदर्शन आयोजन करवाने में शामिल होने के अलावा उसके खिलाफ कोई आरोप नहीं है। हमारी राय में आरोप पत्र और उसमें दी गई सामग्री के अनुसार भी वह आरोप नहीं बनते जो लगाए गए हैं। सरकार मुद्दों को उलझाकर किसी को जमानत देने को विफल नहीं कर सकती।
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खंडपीठ ने कहा कि भड़काऊ भाषण देने, चक्का जाम करवाने, महिलाओं को धरने के लिए उकसाने तथा वहां सामान जमा करने तथा अन्य आरोप केवल इस बात का साक्ष्य हैं कि वह धरना आयोजन में शामिल थी, लेकिन ऐसा कोई आरोप नहीं है कि उसने हिंसा भड़काई, या आतंकी कृत्य किया या इसकी साजिश की।
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वहीं कलिता के बारे में खंडपीठ ने गौर किया कि उसने महिला अधिकार संगठन या अन्य समूह की सदस्य होने के नाते उसने सीएए और एनआरसी के विरोध में धरना प्रदर्शन करवाने में सहायता की और उसमें शामिल हुई। शांतिपूर्ण और बिना हथियार प्रदर्शन का मौलिक अधिकार की सीमा का उल्लंघन नहीं किया और उसे यूएपीए के तहत परिभाषित आतंकी कृत्य की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता, जब तक उसके लिए जरूरी तत्व संबंधित आरोपों में हों।
 

खंडपीठ ने कहा कि भड़काऊ भाषण देना या चक्का जाम करना उस समय असामान्य बात नहीं है, जब सरकार व संसद के कार्यों का व्यापक स्तर पर विरोध हो रहा हो। अगर हम मान भी लें कि भड़काऊ भाषण, चक्का जाम, महिलाओं को प्रदर्शन के लिए उकसाना और अन्य कार्य जिनका कलिता पर आरोप हैं, अगर संविधान में दिए गए शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार की सीमा का उल्लंघन करते हैं, तब भी आतंकी कृत्य, उसकी साजिश या उसकी तैयारी के दायरे में नहीं कहे जाएंगे।

 

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