Delhi: 53,000 पुलिस अधिकारी साइकिल रखने की आड़ में ले रहे भत्ता, कोर्ट ने मांगा जवाब, हर साल इतने करोड़ हो रहे खर्च
मुख्य न्यायाधीश सतीश चंद्र शर्मा व न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद की पीठ ने वकील संसेर पाल सिंह की जनहित याचिका के सभी पक्षों को 20 सितंबर तक अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया है। याचिका में कहा गया है कि एक सरकारी कर्मचारी जो भत्ता पाने के लायक नहीं है, वह भ्रष्टाचार का एक रूप है क्योंकि करदाताओं की गाढ़ी कमाई से भुगतान किया जाता है।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
दिल्ली उच्च न्यायालय ने 53,000 से अधिक पुलिस अधिकारियों के धोखाधड़ी से साइकिल का उपयोग करने के लिए भत्ता लेने के आरोप पर केंद्र, दिल्ली सरकार और दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। दायर याचिका में पुलिस अधिकारियों द्वारा यात्रा भत्ते के अलावा साइकिल उपयोग करने की आड़ में साइकिल (रखरखाव) भत्ता का दावा करने वाले संबंधित पुलिस अधिकारियों की जांच की मांग की गई है।
मुख्य न्यायाधीश सतीश चंद्र शर्मा व न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद की पीठ ने वकील संसेर पाल सिंह की जनहित याचिका के सभी पक्षों को 20 सितंबर तक अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया है। याचिका में कहा गया है कि एक सरकारी कर्मचारी जो भत्ता पाने के लायक नहीं है, वह भ्रष्टाचार का एक रूप है क्योंकि भुगतान किया जाता है करदाताओं की गाढ़ी कमाई से।
याचिकाकर्ता ने कहा कि दिल्ली पुलिस के अधिकारियों को साइकिल (रखरखाव) भत्ता के नाम पर 180 रुपये का भत्ता दिया जाता है और उस मद के तहत सालाना लाखों रुपये निकाले जाते हैं। याचिकाकर्ता ने कहा कि सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत दिल्ली पुलिस के सूचना अधिकारी ने बताया कि 53,000 से अधिक दिल्ली पुलिस के अधिकारी प्रति माह 96,00,000 की राशि प्राप्त कर रहे है। यानि प्रति वर्ष 11,52,00,000 रुपये साइकिल (रखरखाव) भत्ते के नाम पर ले रहे है।
याचिकाकर्ता ने कहा कि उसने अधिकारियों से लिखित शिकायत की, लेकिन उस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। याची ने कहा 53,000 से अधिक दिल्ली पुलिस के अधिकारी जो साइकिल का उपयोग करने की आड़ में धोखाधड़ी से साइकिल (रखरखाव) भत्ता प्राप्त कर रहे हैं, लेकिन वे वास्तव में साइकिल का उपयोग नहीं कर रहे हैं और ऐसे दिल्ली पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कड़ी विभागीय कार्रवाई करने के अलावा कानूनी कार्रवाई की जाए।