दिल्ली सरकार के तोहफे से बहुत खुश ना हों गेस्ट टीचर्स अभी बाकी हैं ये पेंच
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दिल्ली सरकार ने दशहरे से पहले गेस्ट टीचर्स के लिए एक बड़े तोहफे का ऐलान किया है। इससे दिल्ली सरकार के स्कूलों में काम करने वाले 15000 गेस्ट टीचर्स को बहुत बड़ी राहत मिलेगी।
हालांकि गेस्ट शिक्षकों को नियमित करने का बिल सरकार कैबिनेट में पास कर चुकी है और इसे विधानसभा में भी पेश करेगी। लेकिन सरकार के इस बड़े फैसले में उसके सामने अड़ंगा आने की आशंका है।
उपमुख्यमंत्री ने ये बड़ा ऐलान तो कर दिया है लेकिन इसे अमली जामा पहनाने में बड़ी तकनीकी दिक्कत है। चूंकि दिल्ली एक केंद्र शासित प्रदेश है और यहां कोई भी बिल पास होने से पहले इसकी फाइलें संबंधित विभागों से मंज़ूर होकर फिर एलजी की स्वीकृति के बाद कैबिनेट में आएं।
कैबिनेट से पास होने के बाद इसे विधानसभा के पटल पर रखा जाता जहां यह पास होकर कानून बनता है। हालांकि इस बिल के साथ ये सारी प्रक्रिया नहीं अपनाई गई। शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया ने इस बारे में खुद बताया कि हम काफी समय से कोशिश कर रहे थे कि इसकी फाइलें नीचे से मंजूर होकर एलजी की स्वीकृति के बाद आए।
नहीं पूरी की परंपरागत प्रक्रिया
उन्होंने आगे कहा, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। एलजी के पास से नहीं हो पा रहा था और गेस्ट टीचर्स का समय निकला जा रहा था इसलिए बुधवार को ये प्रस्ताव टेबल एजेंडा के रूप में रखा गया और पास कर दिया गया।
इसका सीधा मतलब है कि ये प्रस्ताव परंपरागत तरीके से कैबिनेट में नहीं लाया गया। इसके तहत वित्त, शिक्षा, कानून, सर्विस आदि विभाग की मंजूरी के साथ उपराज्यपाल की मंजूरी ली जाती है।
बता दें कि इससे पहले भी दिल्ली सरकार के अधिकतर बिल विधानसभा से तो पास हुए, लेकिन एलजी या केंद्र सरकार ने उसको मंज़ूरी नहीं दी क्योंकि बताया गया कि प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ।
नोटबंदी से की अपने फैसले की तुलना
बता दें कि मौजूदा प्रस्ताव के मुताबिक-जिन गेस्ट टीचर्स ने CTET यानी कॉमन टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट पास किया है वही 15000 टीचर इसके तहत पक्के होंगे।
हालांकि मनीष सिसोदिया ने प्रक्रिया का पालन ना करने और प्रस्ताव पास करने पर अपना ही तर्क दिया। उन्होंने कहा- जैसे प्रधानमंत्री ने नोटबंदी का फैसला किसी विभाग से मंजूरी लेकर नहीं किया था इसी तरह किसी भी प्रस्ताव को कैबिनेट में लाने का अधिकार मुख्यमंत्री या उनकी अनुमति से किसी मंत्री को है।
सिसोदिया की इसी बात से समझा जा सकता है कि उन्हें यह डर है कि बिल लाने पर उन पर सवाल उठ सकते हैं।