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Delhi Election: सियासत में जाट नेताओं की रही है मजबूत भागीदारी, CM से लेकर केंद्र सरकार में चमक बिखेरी

Thu, 09 Jan 2025 09:19 PM IST
अनुज कुमार विनोद डबास, अमर उजाला, दिल्ली
विनोद डबास, अमर उजाला, दिल्ली Published by: अनुज कुमार Updated Thu, 09 Jan 2025 09:19 PM IST
सार

जाट नेताओं के मुताबिक, आजादी के बाद के दो दशकों में भागीदारी कम रही। पहली बार 1971 में नेताओं ने दमदार मौजूदगी दिखाई। बाहरी दिल्ली क्षेत्र से दलीप सिंह सांसद चुने गए और हीरा सिंह दिल्ली महानगर परिषद में कार्यकारी पार्षद बने। 

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Delhi Election 2025 Jat leaders have had a strong participation in Delhi politics
अरविंद केजरीवाल और प्रवेश वर्मा - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

दिल्ली की सियासत में जाट नेताओं की भागीदारी अहम रही है। जाट नेताओं ने मुख्यमंत्री से लेकर केंद्र सरकार में भी चमक बिखेरी है। वहीं, दिल्ली प्रदेश में पार्टी की कमान संभाली है। इसकी बड़ी वजह दिल्ली देहात में जाटों का प्रभावी होना रहा है। तुलनात्मक तौर पर दूसरे सामाजिक समुदायों से संख्या में कम होने के बावजूद यह अपने आसपास रहने वाले लोगों को प्रभावित करते हैं। यही वजह है कि बृहस्पतिवार को केजरीवाल ने दिल्ली चुनाव में जाट आरक्षण को हवा देने की कोशिश की है। बिना देरी किए भाजपा ने भी केजरीवाल का जवाब देने के लिए जाट समुदाय के नेता प्रवेश साहिब सिंह वर्मा को मैदान में उतार दिया।
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जाट नेताओं के मुताबिक, आजादी के बाद के दो दशकों में भागीदारी कम रही। पहली बार 1971 में नेताओं ने दमदार मौजूदगी दिखाई। बाहरी दिल्ली क्षेत्र से दलीप सिंह सांसद चुने गए और हीरा सिंह दिल्ली महानगर परिषद में कार्यकारी पार्षद बने। इस बीच दलीप सिंह को कांग्रेस ने प्रदेश अध्यक्ष भी बना दिया। इसके बाद लगातार चार बार 1980 में सज्जन कुमार, 1984 में भरतसिंह, 1989 में तारीफ सिंह और 1991 में दोबारा सज्जन कुमार दिल्ली से सांसद चुने गए।

दिल्ली में 1993 में भाजपा की सरकार बनने के बाद साहिब सिंह वर्मा को मंत्री बनाया गया। उनका सियासी सफर आगे बढ़ता रहा और 1996 में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर भी काबिज हुए। दूसरे विधानसभा चुनाव में जब दिल्ली में कांग्रेस की सरकार बनी तो 1998 से 2003 के मध्य जाट नेता डॉ. योगानंद शास्त्री व दीपचंद बंधु मंत्री बने।

2003 में डा. योगानंद शास्त्री दिल्ली सरकार में फिर मंत्री बने और 2008 में विधानसभा अध्यक्ष बनाया गया। इधर, संसद पहुंचने का क्रम 1999 से अब तक चलता रहा। 1999 में साहिब सिंह सांसद चुने गए तो वर्ष 2004 में सज्जन कुमार सांसद बनने में सफल हुए। 2009 में रमेश कुमार और 2014 व 2019 में प्रवेश वर्मा सांसद चुने गए। 2024 के आम चुनाव में कमलजीत सहरावत सांसद बनी हैं। आप ने भी इस समुदाय के नेताओं को तवज्जो दी है। 2015 से 2025 तक पहले कैलाश गहलोत और अब रघुविंद्र शौकीन मंत्री हैं।

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दिल्ली देहात की कई सीटों पर धमक
राजनीतिक दलों से जुटाए गए आंकड़ों के मुताबिक, दिल्ली में जाटों की आबादी करीब साढ़े सात प्रतिशत है। जाटों का सबसे अधिक बोलबाला नजफगढ़, नांगलोई, मुंडका, बवाना, नरेला, मटियाला, विकासपुरी, उत्तम नगर, पालम, बिजवासन, महरौली, दिल्ली कैंट विधानसभा सीटों पर है। यही वजह है कि तीनों राजनीतिक दल इसी समुदाय से ताल्लुक रखने वाले नेताओं को यहां से टिकट देते हैं।

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साढ़े तीन दशक पुरानी है आरक्षण की मांग
जाट आरक्षण का मुद्दा करीब साढ़े तीन दशक पुराना है। 1990 से हर चुनाव में जाट समुदाय आरक्षण की मांग करता रहा है। 2014 में तत्कालीन यूपीए सरकार ने जाटों को केंद्रीय स्तर पर आरक्षण दे दिया। इससे मामला शांत होता दिखा, लेकिन 2015 में सुप्रीम कोर्ट से सरकार के फैसले के रद्द होने के बाद दोबारा यह मुद्दा गरमा गया। आरक्षण के आंदोलन में सक्रिय रहे दिल्ली जाट महासभा के अध्यक्ष हरपाल राणा बताते हैं कि 1990 में जनता दल सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशें लागू कर पिछड़े वर्गों को 27 फीसदी आरक्षण का लाभ दिया, लेकिन जाट इसमें शामिल नहीं थे। दूसरे सामाजिक समूहों के साथ जाटों ने इसका सख्त विरोध किया।

इस बीच जनता दल नेता अजित सिंह ने जाटों को आरक्षण दिलाने की मुहिम शुरू की। उन्होंने 135 सांसदों के हस्ताक्षर कराकर केंद्र सरकार को ज्ञापन सौंपा। फिर भी जाट खुश नहीं हुए। 1996 से जाट युवाओं ने अपने-अपने राज्यों में आरक्षण की मांग तेज की। 1998 में कांग्रेस ने राजस्थान विधानसभा चुनाव में जाटों को आरक्षण का वादा किया। जीत के बाद कांग्रेस सरकार ने इसे टाल दिया। इसके विरोध में जाटों ने आंदोलन शुरू किया।

वर्ष 1999 में एनडीए सरकार ने राजस्थान (भरतपुर और धौलपुर को छोड़कर) के जाटों को केंद्रीय स्तर पर आरक्षण दे दिया। इसके बाद दिल्ली और अन्य राज्यों में भी जाटों को आरक्षण का लाभ मिला।उधर, किसान छात्र संघ के अध्यक्ष नरेश शौकीन ने बताया कि वर्ष 2014 में यूपीए सरकार ने केंद्र में जाटों को आरक्षण दिया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में इस फैसले को खारिज कर दिया। इसके बाद हरियाणा में वर्ष 2016 में जाट आरक्षण के लिए बड़े पैमाने पर हिंसक प्रदर्शन हुए। इसके बाद से कई बार भाजपा नेताओं ने जाटों को आरक्षण देने का वादा किया, लेकिन अभी तक उन्हें आरक्षण नहीं मिला है।

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