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दिल्ली एम्स के अध्ययन में खुलासा, कम उम्र और स्वस्थ व्यक्तियों में भी कोरोना वायरस के मिल रहे घातक परिणाम

Tue, 25 Aug 2020 03:49 AM IST
Vikas Kumar परीक्षित निर्भय, अमर उजाला, नई दिल्ली
परीक्षित निर्भय, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Vikas Kumar Updated Tue, 25 Aug 2020 03:49 AM IST
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Delhi AIIMS study reveals corona virus fatalities even in young and healthy individuals
कोरोना मरीज - फोटो : पीटीआई

कोरोना वायरस को लेकर अभी तक कहा जा रहा था कि बुजुर्ग और पहले से बीमार पीड़ितों में संक्रमण के घातक परिणाम मिल रहे हैं लेकिन देश के सबसे बड़े चिकित्सीय संस्थान एम्स के अध्ययन में खुलासा हुआ है कि कम उम्र और कोरोना की चपेट में आने से पहले स्वस्थ व्यक्तियों में भी घातक परिणाम देखने को मिल रहे हैं। सांस लेने में दिक्कत, हेमेटोलॉजिकल पैरामीटर और लैक्टेट ज्यादा होने की वजह से उन लोगों की भी मौत हो रही है जिन्हें कोरोना से पहले किसी भी तरह की बीमारी नहीं थी। ये मौतें अस्पताल में भर्ती होने से 24 घंटे के अंदर हुईं। 

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दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के एनेस्थिसियोलॉजी विभाग के डॉ. दलिम कुमार बैद्य का कहना है कि अभी तक संक्रमण से मरने वाले या गंभीर हालत वालों में 70 फीसदी भागीदारी बुजुर्ग और डायबिटीज, हार्ट, किडनी जैसे रोगियों की बताई जा रही थी लेकिन एम्स के अध्ययन में दो महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए हैं। इनमें पहला यह कि कम उम्र या कोरोना होने से पहले स्वस्थ व्यक्तियों में भी घातक रूप देखने को मिल रहा है। वहीं दूसरा यह 50 फीसदी मरीजों में ऑक्सीजन की कमी की दिक्कत हो रही है जिसकी वजह से मौतें भी ज्यादा हो रही हैं। अध्ययन के दौरान 20 मरीजों की मौत हुई थी जिनमें 19 मरीजों के मरने का कारण एक समान है। अस्पताल आने के 24 घंटे के भीतर सबसे ज्यादा इन मरीजों की मौत दर्ज की जा रही है।
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आईसीयू में 8.5 फीसदी की मौतें
इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईजेएमआर) में प्रकाशित अध्ययन में शामिल 235 मरीजों में लक्षण मिलने की औसतन अवधि 2 से पांच दिन मिली है। इनमें 15 से लेकर 57 वर्ष तक के मरीज शामिल हैं। साथ ही वे मरीज भी शामिल हैं जिन्हें कोरोना होने से पहले किसी भी तरह की दिक्कत नहीं थी। इसके अलावा 68.1 फीसदी को बुखार, 59.60 फीसदी को खांसी, 71.9 फीसदी को सांस लेने में तकलीफ, 28.1 फीसदी को उच्च रक्तचाप और 23.3 फीसदी मधुमेह से पीड़ित थे। अध्ययन में यह भी पता चला है कि आईसीयू में भर्ती कोरोना मरीजों में 8.5 फीसदी की मौत भर्ती होने के 24 घंटे में हो रही है।
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हाई फ्लो नसल कैनुला की जरूरत
डॉ. बैद्य ने बताया कि एम्स में भर्ती मरीजों पर अध्ययन के दौरान 50 फीसदी (गंभीर अवस्था वाले) में ऑक्सीजन की कमी की दिक्कत देखने को मिली है। इन्हें तत्काल हाई फ्लो नसल कैनुला की जरूरत होती है। जिससे जान बचाई जा सकती है। साथ ही सांस की नली डालने की आवश्यकता भी नहीं होती है। इससे समय का बचाव होने के साथ ही मरीज को समय पर राहत मिलनी शुरू हो जाती है। हालांकि ज्यादातर अस्पतालों में हाई फ्लो नसल कैनुला की उपलब्धता कम है। इनके अलावा इनवेसिव मैकेनिकल वेंटिलेशन भी दिया जा सकता है। उन्होंने यह भी बताया कि अध्ययन अभी भी जारी है। जल्द ही इसके और भी चौंकान्ने वाले परिणाम सामने आ सकते हैं।


टीएलसी ज्यादा होने पर जान का खतरा भी ज्यादा
एम्स के डॉक्टरों के अनुसार, कोरोना वायरस से संक्रमित मरीजों के रक्त में टीएलसी की संख्या 13 हजार से भी अधिक मिल रही हैं। हालांकि ऐसे मामलों में जान का खतरा भी सबसे ज्यादा है। अध्ययन के दौरान 235 में से 20 मरीजों की मौत हुई थी। इन सभी मरीजों में टीएलसी 13 हजार से अधिक था।

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