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वो ई रिक्शा में औलाद को लिए यहां-वहां दौड़ता रहा, इलाज के अभाव में तोड़ा दम

Thu, 28 Sep 2017 09:33 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, नई दिल्ली
ब्यूरो/अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Thu, 28 Sep 2017 09:33 AM IST
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death of newborn at hospital Ventilator dose not meet
demo pic - फोटो : सांकेतिक चित्र
सप्ताह भर पहले वेंटीलेटर के अभाव में बच्चे की मौत के बाद एक और मामले ने दिल्ली स्वास्थ्य सिस्टम को हिला कर रख दिया है। बुधवार सुबह वेंटीलेटर के अभाव में एक और नवजात शिशु ने दम तोड़ दिया। आरोप है कि बच्चे के लिए एंबुलेंस तक उपलब्ध नहीं कराई गई। बेबस पिता मौत की दहलीज पर खड़े नवजात को लेकर ई रिक्शा में तीन घंटे राजधानी की सड़कों पर दौड़ता रहा।
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लेकिन आखिर में नवजात शिशु जंग हार गया और रोहिणी स्थित डॉ. भीमराव आंबेडकर अस्पताल पहुंचने से पहले ही उसकी मौत हो गई। यहां डॉक्टरों ने नवजात को ब्रॉड डेड घोषित कर दिया। परिजनों ने संजय गांधी मैमोरियल अस्पताल पर उपचार में लापरवाही और इलाज की जगह डॉक्टरों पर चैङ्क्षटग करने के संगीन आरोप लगाए हैं। संजय गांधी अस्पताल प्रबंधन से जवाब मांगा गया तो वहां से कोई जानकारी नहीं दी गई।    
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दरअसल, पीरागढ़ी कैंप निवासी मनोज की पत्नी तुलसी ने बुधवार सुबह अपने घर पर एक बेटे को जन्म दिया। सुबह करीब 9 बजे जन्म के बाद बच्चे को सांस लेने में तकलीफ थी। इसलिए परिजन उसे संजय गांधी मैमोरियल अस्पताल लेकर पहुंचे। जैसा कि मनोज के पिता पूरन सिंह ने बताया, अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड पहुंचने के बाद डॉक्टरों ने पहले तो बच्चे को दूर से देखा।
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डॉक्टर कुर्सी पर बैठे थे और आपस में हंसी मजाक कर रहे थे। इसी बीच जब पूरन और मनोज ने डॉक्टरों से इलाज के बारे में बोला तो उनमें से एक डॉक्टर ने कहा कि यहां वेंटीलेटर नहींहै। इसलिए बच्चे को तत्काल लेकर भीमराव आंबेडकर अस्पताल पहुंचे। वहां उपचार जल्दी मिल जाएगा। परिजनों के मुताबिक अस्पताल प्रबंधन की ओर से उस वक्त एंबुलेंस तक उपलब्ध नहींकराई गई। ई रिक्शा में बैठ परिजन ट्रैफिक से होते हुए करीब 11 बजे रोहिणी स्थित भीमराव आंबेडकर अस्पताल पहुंचे, लेकिन तब तक उनका नवजात शिशु दम तोड़ चुका था।      

दाई ने कराया था जन्म, डॉक्टरों ने नहीं की प्रसूति      
पूरन ने बताया कि गर्भ धारण करने के बाद से ही तुलसी का उपचार संजय गांधी मैमोरियल अस्पताल में चल रहा था। बीते तीन दिन से उसे काफी लेबर पेन हो रहा था, लेकिन डॉक्टर दर्दनिवारक गोली देकर घर जाने को बोल देते थे। बुधवार सुबह जब तुलसी को तेज दर्द हुआ था तो पास में ही एक दाई हैं, उन्हें बुलाकर प्रसूति कराई गई थी। इसी बीच पता चला कि प्रसूति सात महीने की होने की वजह से ही बच्चे को सांस लेने में दिक्कत हो रही थी।

      
सरकार क्यों नहीं ले रही सबक      
स्वास्थ्य को लेकर लंबे समय से कार्यरत एडवोकेट अशोक अग्रवाल का कहना है कि आखिर दिल्ली सरकार कब तक ऐसे मामलों पर आंख मूंद करके बैठी रहेगी। सरकार बाहरी मरीजों की बातें करती है, जबकि सच यह है कि ये और इससे पहले हुई नवजात की मौत, दोनों ही परिजन दिल्ली के राशनकार्ड धारी हैं। बड़ा सवाल है कि आखिर दिल्ली सरकार कैसे बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने का दावा कर रही है।
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