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नई तकनीक: लो-डोज सीटी स्कैन से जल्द पकड़ में आएगा फेफड़ों का कैंसर, एम्स ने स्क्रीनिंग का अध्ययन किया शुरू

Sat, 23 Dec 2023 01:39 AM IST
विजय पुंडीर अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: विजय पुंडीर Updated Sat, 23 Dec 2023 01:39 AM IST
सार

विशेषज्ञों की मानें तो अभी मौजूदा समय में फेफड़ों के कैंसर की स्क्रीनिंग के लिए कोई सरल व सुलभ तकनीक इस्तेमाल नहीं हो रही। डॉक्टरों को जिन मरीजों में लक्षण दिखते हैं उनकी बायोप्सी करवाई जाती है।

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CT scan will detect lung cancer soon
फेफड़ा

विस्तार

अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम सहित अन्य विकसित देशों के बाद भारत में भी जल्द लो-डोज सीटी स्कैन से फेफड़ों का कैंसर जल्द पकड़ में आएगा। इस तकनीक की मदद से एम्स के पल्मोनरी मेडिसिन विभाग ने फेफड़ों के कैंसर की स्क्रीनिंग करने का अध्ययन शुरू किया। यह स्क्रीनिंग टेस्ट एक नियमित सीटी स्कैन की तरह ही काम करता है। इसमें काफी कम विकिरण खुराक दी जाती है। इस जांच में जोखिम काफी कम रहता है और इसे आसानी से किया जा सकता है।

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विशेषज्ञों की मानें तो अभी मौजूदा समय में फेफड़ों के कैंसर की स्क्रीनिंग के लिए कोई सरल व सुलभ तकनीक इस्तेमाल नहीं हो रही। डॉक्टरों को जिन मरीजों में लक्षण दिखते हैं उनकी बायोप्सी करवाई जाती है। यह बायोप्सी दो तरीके से होती है। कुछ मामलों में ब्रोंकोस्कोप की मदद से और कुछ मामलों में सीटी स्कैन की मदद से नीडल डालकर ट्यूमर का सैंपल लिया जाता है। यही कारण है कि अधिकतर मरीज एडवांस स्टेज पर इलाज करवाने आते हैं और उन्हें पूरी तरह से ठीक कर पाना संभव नहीं होता।
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देश में साल 2022 में फेफड़ों के कैंसर के करीब 1,03,371 मामले सामने आए थे। इनमें से अधिकांश रोगी एडवांस स्टेज के थे। देरी से कैंसर का पता चलने के कारण इलाज प्रभावित होता है और रोगी की कुल जीवित रहने की औसत अवधि केवल 8.8 महीने रहती है। इस समस्या को देखते हुए एम्स के डॉक्टरों ने लो-डोज सीटी पर अध्ययन शुरू किया है। इस जांच की मदद से फेफड़ों के कैंसर को जल्द पकड़ने का प्रयास किया जाएगा, ताकि जल्द रोगियों की पहचान कर जांच शुरू की जा सके।

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डॉक्टरों को उम्मीद है कि इस तकनीक से बीमारी की पहचान लक्षण आने से पहले हो सकेगी। ऐसा होने पर हर साल हजारों मरीजों को बचाया जा सकेगा। इन जांच के बारे में डॉक्टरों का कहना है कि अमेरिका में यह जांच होती है और इसकी मदद से फेफड़ों के कैंसर से होने वाली मौत को 20 फीसदी तक कम किया जा सका है।

धूम्रपान करने वाले होंगे अध्ययन में शामिल
एम्स के अध्ययन से जुड़े पल्मोनरी मेडिसिन विभाग के डॉक्टर आयुष गोयल ने बताया कि इस अध्ययन में 20 साल से प्रतिदिन एक पैकेट सिगरेट पीने वाले 50 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों को शामिल किया जाएगा। यह लोग एम्स के 9821735337 नंबर पर संपर्क कर सकते हैं। यहां फोन करने पर डॉक्टर मरीज से पूरी जानकारी लेगा। बाद में अध्ययन के लिए मानकों को पूरा करने वाले लोगों को ओपीडी में बुलाकर लो-डोज सीटी स्कैन जांच की जाएगी। इसके बाद यह देखा जाएगा कि इस जांच की मदद से कैंसर की पहचान शुरुआती दौर में कितनी सफल रूप से हो पाती है। उन्होंने कहा कि अभी लक्षण वाले मरीजों की बायोप्सी जांच होती है तो बीमारी काफी फैल चुकी होती है। अध्ययन में उन लोगों को टारगेट किया जा रहा है, जिन्हें शुरुआती स्टेज का ट्यूमर तो होता है लेकिन लक्षण नहीं होता और वे शारीरिक रूप से ठीक दिख रहे होते हैं।

लक्षणों को हल्के में लेते हैं मरीज
एम्स के डॉक्टरों का कहना है कि अक्सर कैंसर के मरीज लक्षणों को हल्के में लेते हैं। कैंसर विभाग में जांच के लिए आने वाले मरीजों में देखा गया है कि फेफड़ों का कैंसर होने पर खांसी, बलगम, बलगम के साथ खून आने, सांस में परेशानी, सीने में दर्द के शुरुआती लक्षण दिखते हैं। इसके अलावा अन्य बीमारी और क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) की समस्या भी आती है, लेकिन मरीज इन्हें नजरअंदाज करते हैं। स्थिति गंभीर होने के बाद जांच का ज्यादा फायदा नहीं मिल पाता।

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