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Delhi NCR News: स्कूल पाठ्यक्रम में शामिल हो सकता है सीपीआर, बचेगी हजारों की जान

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Tue, 23 Jul 2024 08:17 PM IST
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- हर मिनट में दो लोग दिल के दौरे से गंवा रहे जान, एम्स ने बचाव के लिए किया अध्ययन
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- दिल्ली में 15 स्कूलों के 4500 छात्रों को दी गई सीपीआर की ट्रेनिंग, 3 साल के बाद परिणाम मिले बेहतर
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। छठी से बारहवीं कक्षा के छात्रों के लिए पाठ्यक्रम में कार्डियोपल्मोनरी रिससिटेशन (सीपीआर) का कोर्स शामिल हो सकता है। एम्स, विश्व स्वास्थ्य संगठन ने आपातकालीन और अभिघात देखभाल सहयोग केंद्र (डब्ल्यूएचओ सीसीईटी) के साथ मिलकर इस कार्यक्रम और कौशल को शारीरिक शिक्षा में एकीकृत करने का सुझाव दिया।
दरअसल, एम्स ने आईसीएमआर के वित्तीय सहयोग से एक अध्ययन किया। एम्स के इमरजेंसी मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डॉ. संजीव भोई ने इस अध्ययन में दिल्ली के 15 स्कूलों से 4500 छात्रों को शामिल किया था। यह अध्ययन तीन साल तक चला। इस अध्ययन में छात्रों को सीपीआर की ट्रेनिंग दी गई। अध्ययन के परिणाम बेहतर आए। सभी छात्र और शिक्षक सीपीआर सीखने के लिए उत्साहित थे। ट्रेनिंग के बाद ज्ञान और कौशल में काफी सुधार दिखा। इस अध्ययन से पता चला कि 6वीं कक्षा के बाद के छात्रों को इसे आसानी से सीखा सकते हैं। वहीं, मांसपेशियों की ताकत की बात करें तो 11वीं और 12वीं कक्षा के छात्रों का कौशल बेहतर रहा।
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अध्ययन के बाद मंगलवार को भारत में स्कूल सीपीआर कार्यक्रम को लागू करने के लिए पहली बैठक एम्स में हुई। इस बैठक में नीति आयोग के सदस्य डॉ. विनोद पॉल, एनसीईआरटी के निदेशक प्रो. दिनेश प्रसाद सकलानी, एम्स के निदेशक डॉ. एम श्रीनिवास, एनएचआरएससी के सलाहकार डॉ. के मदन गोपाल, सीएचईबी (केंद्रीय स्वास्थ्य शिक्षा ब्यूरो) के डीडीजी डॉ. गौरी सेनगुप्ता और डब्ल्यूएचओ/एसईएआरओ के पूर्व (सेवानिवृत्त) डॉ. पतंजलि देव नायर ने अपना पक्ष रखा।
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इसलिए पड़ी जरूरत
देश में हर मिनट दो लोग दिल के दौरे या दूसरे कारण से जान गंवा रहे हैं। इसके कारण हर साल 45 लाख लोगों की जान चली जाती है। इनमें बड़ी संख्या में लोग युवावस्था में ही मर जाते हैं। ऐसे लोगों को तत्काल सीपीआर देकर मृत्यु दर को आधे से एक-चौथाई स्तर पर कम किया जा सकता है। इसमें स्कूली बच्चे बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। यह परिवार और आसपास के लोगों को जरूरत के समय सीपीआर देकर जान बचा सकते हैं।


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यूरोप के मुकाबले 5 गुना कम
अध्ययन में बताया गया है कि कई यूरोपीय देश में लोग सीपीआर के प्रति जागरूक हैं। इसके कारण 50 फीसदी लोगों को दिल के दौरे के तुरंत बाद सीपीआर मिल पाता है। भारत में यह आंकड़ा 0-10 फीसदी तक हैं। देश में दिल के दौरे की संख्या काफी अधिक है।
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