Coronavirus: लॉकडाउन ने बदला जीबी रोड की महिलाओंं का पुलिस के प्रति नजरिया
- आज पुलिस इनके लिए सबसे बड़ी मददगार बन गई है
- हर सेक्स वर्कर को मिल रही रोटी केवल पुलिस की मदद से
- यौनकर्मियों, उनके बच्चों के लिए काम कर रहीं ललिता को है बहुतों से शिकायत
विस्तार
पहले जब कभी पुलिस की दस्तक होती थी, तो यहां काम करने वाली महिलाओं का माथा ठनक जाता था। पुलिसवालों के लिए कई तरह के बदनामी वाले शब्दों का इस्तेमाल होता था। मगर आज वही पुलिस इनके लिए सबसे बड़ी मददगार बन गई है।
या यूं कहें कि इस आपदा की घड़ी में आज इनके पेट की आग बुझ रही है तो उसका श्रेय पूरी तरह दिल्ली पुलिस को जाता है। इनके बच्चों के लिए चल रहे स्कूल को भी पुलिस की ही मदद का भरोसा है।
हर सेक्स वर्कर को मिल रही रोटीः केवल पुलिस की मदद से
दिल्ली के इस रेड लाइट एरिया में करीब 73 कोठे हैं, जहां एक हजार से ज्यादा सेक्स वर्कर यहां मौजूद हैं। यहां रहने वाली सेक्स वर्कर्स के लिए दिल्ली पुलिस रोजाना हर कोठे में खाना पहुंचाती है जो पास के एक गुरुद्वारा से आता है। वहां से पुलिस चौकी पर खाना भेजा जाता है।
पुलिसकर्मी खाने के पैकेट लेकर हर कोठे के नीचे पहुंचते हैं। सेक्स वर्कर नीचे आकर पैकेट ले लेती है। पुलिस वाला यह भी पूछ लेता है कि और किसी तरह की कोई जरूरत हो तो बता देना। कई बार ऐसा भी होता है कि पुलिस अपने प्रयासों से यहां की महिलाओं के लिए खाना बनवाकर लाती है।
कोठा नंबर 52 में रह रही कमला (बदला हुआ नाम) का कहना है कि इस संकट की घड़ी में पुलिस ने जो मदद की है, उसे जुबान से कह पाना मुश्किल है। अगर पुलिस आगे कदम न बढ़ाती तो यहां भूखा मरना तय था।
कोठों पर कोई सरकारी मदद नहीं पहुंची। इन महिलाओं के कल्याण के लिए लंबे समय से काम कर रही ललिता.एस.ए भी कहती हैं कि दिल्ली पुलिस न होती तो इन यौनकर्मियों का भूखा मरना तय था।
जीबी रोड पर ही इन्हीं 73 कोठों के बीच एक छोटा स्कूल भी है। यहां पर सेक्स वर्करों के 48 बच्चे पढ़ते हैं। वे यहीं रहते हैं। ललिता.एस.ए, पिछले 30 साल से इन्हीं कोठों के बीच में ये छोटा सा स्कूल चला रही हैं।
यह स्कूल एसपीआईडी-एसएमएस सेंटर (गैर-सरकारी संगठन) की मदद से चलता है। ललिता, इस संस्था की उपाध्यक्ष हैं। वे लंबे समय से सेक्स वर्करों के कल्याण में जुटी हैं।
इन बच्चों का हाल तो बहुतों ने पूछा, मदद किसी ने न की
लॉकडाउन के दौरान इस इलाके में अभी तक इन छोटे-छोटे बच्चों को कहीं से कोई मदद नहीं मिली है। दिल्ली कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स के एक प्रतिनिधि का फोन आया था। उन्होंने कुछ जानकारियां मांगी थी, हमने दे दी। वहां से कुछ उम्मीद बंधी थी, मगर अभी तक मदद के नाम पर एक रोटी तक नहीं मिली।
दिल्ली महिला आयोग ने भी यहां का हालचाल पूछा। मैं बताना चाहूंगी कि केवल हालचाल लिया, बच्चों को किसी तरह की कोई मदद नहीं दी गई। दिल्ली सरकार के एक प्रतिनिधि ने भी बातचीत की थी। उनका कहना था कि वे मदद करेंगे। कोठों पर रहने वाली महिलाओं को भी मदद देंगे।
सरकारी प्रतिनिधि बोले, हमें उन महिलाओं के राशन कार्ड आदि दस्तावेज दे दें। यह बात बहुत परेशान करने वाली थी। ललिता सवाल करती हैं, आज कितने दिन हो गए हैं लॉकडाउन को लागू हुए, यहां न तो एक पैसे की मदद और न ही रोटी पहुंच सकी है।
केवल आश्वासन मिल रहे हैं; इतने दशकों से यह स्कूल चल रहा है तो आगे भी चलेगा। बच्चों को रोजाना की तरह पांच बार खाने को दिया जाता है।
मां के साथ मोबाइल पर बात कराते हैं बच्चों की बात
कोठों पर रहने वाली सेक्स वर्कर अब खाली हैं। वे स्कूल से चंद कदमों की दूरी पर रहती हैं। उनका मन करता है अपने बच्चों से मिलने का, लेकिन कोरोना के संक्रमण की वजह से उन्हें मिलने नहीं दिया जाता।
एसपीआईडी-एसएमएस सेंटर की उपाध्यक्ष के अनुसार, अभी हम किसी को यहां आने की इजाजत नहीं दे रहे हैं। अगर कोई छोटा बच्चा है तो एक निर्धारित दूरी पर खड़ी होकर मां अपने बच्चे से बात कर सकती है। बच्चों की मोबाइल पर बात कराई जाती है।
अभी यहां किसी नए बच्चे को नहीं लिया जा रहा। कई महिलाएं आई हैं अपने बच्चों को छोड़ने, लेकिन उन्हें कहा गया है कि इन बच्चों के स्वास्थ्य की खातिर हम जोखिम नहीं उठा सकते। कोरोना से पैदा हुई स्थिति सामान्य होने के बाद ही नए बच्चे को प्रवेश मिलेगा।