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Delhi NCR News: आप की सियासी ताकत घटाने की राह पर कांग्रेस
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भाजपा से टकराव के बीच बदली चुनावी रणनीति
विनोद डबास
नई दिल्ली। दिल्ली की राजनीति में कांग्रेस की रणनीति अब नए दौर में प्रवेश करती दिख रही है। पार्टी का फोकस केवल भाजपा का मुकाबला करने तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि वह आम आदमी पार्टी (आप) के राजनीतिक प्रभाव को कमजोर करने की दिशा में भी सक्रिय नजर आ रही है। एमसीडी वार्ड समितियों के चुनाव में कांग्रेस के रुख को इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
कांग्रेस का आकलन है कि वर्ष 2013 के बाद उसके संगठन और पारंपरिक वोट बैंक को सबसे बड़ा नुकसान आम आदमी पार्टी के उभार से हुआ। दिल्ली में कांग्रेस का बड़ा जनाधार आप के साथ चला गया, जबकि बाद के वर्षों में पंजाब, गुजरात और गोवा जैसे राज्यों में भी आप के विस्तार ने कांग्रेस की राजनीतिक जमीन को प्रभावित किया। पार्टी के भीतर अब यह धारणा मजबूत हो रही है कि उसके पुनरुत्थान की राह में केवल भाजपा ही नहीं, बल्कि आम आदमी पार्टी भी बड़ी चुनौती है।
इस सोच की झलक हालिया दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी देखने को मिली। चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस ने भाजपा के साथ-साथ अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी पर तीखे हमले किए। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस की मौजूदगी ने करीब 15 विधानसभा सीटों पर आप के वोट बैंक को प्रभावित किया, जिससे पार्टी को नुकसान उठाना पड़ा और वह सत्ता से बाहर हो गई। कांग्रेस भले सरकार नहीं बना सकी, लेकिन उसने चुनावी समीकरण बदलने में अहम भूमिका निभाई।
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इसी रणनीति की झलक अब एमसीडी वार्ड समिति चुनाव में भी दिखाई दी। दक्षिणी वार्ड समिति में कांग्रेस के दोनों पार्षदों ने भाजपा समर्थित उम्मीदवार के पक्ष में मतदान किया, जिससे भाजपा को जीत मिली। राजनीतिक हलकों में इसे कांग्रेस की उस रणनीति के रूप में देखा जा रहा है, जिसके तहत वह उन परिस्थितियों में भाजपा को भी अप्रत्यक्ष लाभ देने से परहेज नहीं कर रही, जहां आम आदमी पार्टी को राजनीतिक नुकसान पहुंचाया जा सके।
हालांकि यह रणनीति हर जगह सफल नहीं रही। रोहिणी वार्ड समिति में कांग्रेस के एक पार्षद ने कथित तौर पर पार्टी लाइन से अलग मतदान किया। इसका फायदा आम आदमी पार्टी को मिला और उसके उम्मीदवार अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष दोनों पदों पर एक-एक वोट के अंतर से जीत दर्ज करने में सफल रहे। राजनीतिक चर्चाओं के अनुसार, यदि कांग्रेस के दोनों वोट भाजपा के पक्ष में जाते, तो यहां भी आप की हार तय मानी जा रही थी।
एमसीडी के ताजा घटनाक्रम ने साफ संकेत दिया है कि दिल्ली की राजनीति में कांग्रेस अब अपनी रणनीति को नए सिरे से गढ़ रही है। आने वाले समय में भाजपा और आम आदमी पार्टी के बीच मुकाबले के साथ कांग्रेस की यह नई पैंतरेबाजी राजधानी की सियासत को और दिलचस्प बना सकती है।
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विनोद डबास
नई दिल्ली। दिल्ली की राजनीति में कांग्रेस की रणनीति अब नए दौर में प्रवेश करती दिख रही है। पार्टी का फोकस केवल भाजपा का मुकाबला करने तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि वह आम आदमी पार्टी (आप) के राजनीतिक प्रभाव को कमजोर करने की दिशा में भी सक्रिय नजर आ रही है। एमसीडी वार्ड समितियों के चुनाव में कांग्रेस के रुख को इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
कांग्रेस का आकलन है कि वर्ष 2013 के बाद उसके संगठन और पारंपरिक वोट बैंक को सबसे बड़ा नुकसान आम आदमी पार्टी के उभार से हुआ। दिल्ली में कांग्रेस का बड़ा जनाधार आप के साथ चला गया, जबकि बाद के वर्षों में पंजाब, गुजरात और गोवा जैसे राज्यों में भी आप के विस्तार ने कांग्रेस की राजनीतिक जमीन को प्रभावित किया। पार्टी के भीतर अब यह धारणा मजबूत हो रही है कि उसके पुनरुत्थान की राह में केवल भाजपा ही नहीं, बल्कि आम आदमी पार्टी भी बड़ी चुनौती है।
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इस सोच की झलक हालिया दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी देखने को मिली। चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस ने भाजपा के साथ-साथ अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी पर तीखे हमले किए। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस की मौजूदगी ने करीब 15 विधानसभा सीटों पर आप के वोट बैंक को प्रभावित किया, जिससे पार्टी को नुकसान उठाना पड़ा और वह सत्ता से बाहर हो गई। कांग्रेस भले सरकार नहीं बना सकी, लेकिन उसने चुनावी समीकरण बदलने में अहम भूमिका निभाई।
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इसी रणनीति की झलक अब एमसीडी वार्ड समिति चुनाव में भी दिखाई दी। दक्षिणी वार्ड समिति में कांग्रेस के दोनों पार्षदों ने भाजपा समर्थित उम्मीदवार के पक्ष में मतदान किया, जिससे भाजपा को जीत मिली। राजनीतिक हलकों में इसे कांग्रेस की उस रणनीति के रूप में देखा जा रहा है, जिसके तहत वह उन परिस्थितियों में भाजपा को भी अप्रत्यक्ष लाभ देने से परहेज नहीं कर रही, जहां आम आदमी पार्टी को राजनीतिक नुकसान पहुंचाया जा सके।
हालांकि यह रणनीति हर जगह सफल नहीं रही। रोहिणी वार्ड समिति में कांग्रेस के एक पार्षद ने कथित तौर पर पार्टी लाइन से अलग मतदान किया। इसका फायदा आम आदमी पार्टी को मिला और उसके उम्मीदवार अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष दोनों पदों पर एक-एक वोट के अंतर से जीत दर्ज करने में सफल रहे। राजनीतिक चर्चाओं के अनुसार, यदि कांग्रेस के दोनों वोट भाजपा के पक्ष में जाते, तो यहां भी आप की हार तय मानी जा रही थी।
एमसीडी के ताजा घटनाक्रम ने साफ संकेत दिया है कि दिल्ली की राजनीति में कांग्रेस अब अपनी रणनीति को नए सिरे से गढ़ रही है। आने वाले समय में भाजपा और आम आदमी पार्टी के बीच मुकाबले के साथ कांग्रेस की यह नई पैंतरेबाजी राजधानी की सियासत को और दिलचस्प बना सकती है।