राजधानी की सड़कों पर दौड़ेंगी चाइनीज बसें!
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देश की मार्केट में धाक जमाने के बाद अब राजधानी की सड़कों पर चाइनीज बसें दौड़ाने की कवायद शुरू हो गई है। इसी के तहत दिल्ली ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन को चीनी प्रतिनिधिमंडल ने बस बेचने में दिलचस्पी दिखाते हुए सेमी लो-फ्लोर बस का डेमो दिया है।
डीटीसी ने पहले ही बस खरीदने के लिए ग्लोबल टेंडर जारी करके देश के साथ-साथ विदेशी कंपनियों की राह भी आसान कर दी थी। चीनी कंपनी की योजना मुंबई व बंगलुरु में भी बसें चलानी की है।
शुक्रवार को डीटीसी मुख्यालय में छह सदस्यीय चीनी बस कंपनी के प्रतिनिधिमंडल ने डेमो दिखाकर बस बेचने की इच्छा जताई है। प्रतिनिधिमंडल ने प्रबंधन से टेंडर समेत उनकी मांग व जरूरत की भी जानकारी ली है।
डीटीसी ने तीसरा ग्लोबल टेंडर सेमी लो-फ्लोर बस के लिए 30 जून को निकाला था, जोकि 29 अगस्त को खुलेगा। हालांकि इससे पहले अक्तूबर 2013 में भी ग्लोबल टेंडर सेमी लो-फ्लोर के लिए निकाला था, लेकिन टाटा के अलावा किसी कंपनी ने उसे नहीं भरा।
मांग के आधार पर बसों का डिजाइन
टाटा ने टेंडर में भाग तो लिया, लेकिन नियम व शर्तें सख्त कर दीं, जिसके चलते प्रबंधन ने उसे रद कर दिया। उससे पहले मार्च 2013 में ग्लोबल टेंडर निकाला गया था जोकि लो-फ्लोर के लिए था। हालांकि उससे में एकमात्र कंपनी ने भाग लिया, जो कि हरी बस के लिए था।
इन दोनों टेंडर में चीनी कंपनियां ने बिड कॉन्फ्रेंस में भाग तो लिया लेकिन टेंडर नहीं भरा था। इस बार कंपनी प्रतिनिधियों का कहना है कि वे टेंडर में भाग लेंगे और बस बेचने में आगे रहेंगे।
सूत्रों के मुताबिक, चीनी कंपनियों ने एसी बसों का डेमो दिया है, जो 42 सीटर है। डीटीसी को बस खरीदने के लिए लगभग डेढ़ साल पहले दो सौ करोड़ रुपये मिले थे, लेकिन अभी तक देशी कंपनियों की बेरुखी, महंगे दाम व मेटीनेंस की सख्त शर्तों के चलते बात नहीं बन पा रही है।
चीन के इंटरनेशनल बिजनेस डिपार्टमेंट डायरेक्टर एशिया एंड पैसेफिक डिवीजन रोबिन शेन ने कहा कि बेशक हम भारत की सड़कों पर चीनी बस चलाने के इच्छुक हैं। इसीलिए बंगलुरु, मुंबई के अलावा डीटीसी से संपर्क साध रहे हैं। हम चीनी बस का डेमो देंगे। डीटीसी नियमों व मांग के आधार पर बसों को डिजाइन किया जाएगा। क्योंकि यहां की सड़कों के आधार पर बसों को विशेष ढंग से डिजाइन करना होगा।
...लेकिन शर्तें भी होंगी
- . चीनी कंपनियां यदि डीटीसी या फिर बंगलुरु व मुंबई में अपनी बस चलाना चाहती हैं तो उन्हें पहले देश में कहीं भी जमीन लेकर सेट-अप तैयार करना होगा। क्योंकि बस बेचने के लिए उन्हें तैयार मॉल को देश के ही किसी हिस्से में स्थापित फैक्टरी में जोड़ना होगा। दूसरा बसों के बेचने के बाद उनकेरख-रखाव का जिम्मा भी उठाना पड़ेगा। क्योंकि मेटीनेंस तो कंपनी ही करती हैं।
- . डीटीसी की टेंडर में पहली शर्त है कि जो भी कंपनी बस बेचेगी, उसका रख-रखाव उक्त कंपनी ही करेगी। क्योंकि डीटीसी किलोमीटर के आधार पर बसों का मूल्य चुकाती है, जिसमें मेटीनेंस भी शामिल होता है। इसी मेंटीनेंस विवाद के चलते डीटीसी प्रबंधन का टाटा व अशोक कंपनी के साथ विवाद शुरू हुआ है। मेंटीनेंस में कमी की बात कहकर डीटीसी प्रबंधन ने उक्त कंपनियों को जुर्माना भी किया है।
- . दिल्ली की सड़कों, ड्राइविंग सिस्टम मोड, जलवायु, यात्रियों के लोड के आधार पर बसों का डिजाइन व बॉडी बनानी होगी।
- . डीटीसी ने यात्रियों की सुविधा के लिए लो-फ्लोर तो उतारीं, लेकिन सड़कों, ब्रेकडाउन व अन्य कारणों के चलते सफल नहीं हो सकीं। इन सब कारणों का भी चीनी कंपनियों को पहले सर्वे व रिसर्च करना होगा, ताकि उन्हें यह समस्या न हो।