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इन्हें है मोदी के मन तक अपनी बात पहुंचाने की जिद

Fri, 14 Nov 2014 04:15 PM IST
Updated Fri, 14 Nov 2014 04:15 PM IST
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Childrens of Balaknama want meets to Modi

दिल्ली की सड़कों पर कूड़ा बीनता, गालियां सुनता, बोतलें जमा करने वाला

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बचपन अपने मन की बात कह रहा है। देश भर के कई शहरों से आए बेघर बच्चे दिल्ली की भीड़-भाड़ वाली जिंदगी में कहीं खो से जाते हैं। इनका बचपन कहीं बोतलें बीनते, होटलों पर काम करते और दिल्ली के लोगों की गालियां सुनते बीत जाता है।

कभी छोटू चाय की दुकान पर काम करता दिखता है तो कभी अखबार बेचता। क्या आप यकीन करेंगे कि दिल्ली की सड़कों पर अखबार बेचने वाले बेघर अब खुद अखबार मालिक बन गए हैं।

सड़कों पर अपने भविष्य की लड़ाई लड़ता देश का भविष्य कागजों पर अपना भविष्य उकेर रहा है। ये कहानी है बालकनामा की जिसने भटकते बचपन को एक नयी राह दी है। बालकनामा में कहानियां ढूंढने और लिखने से लेकर अखबार छापने तक में ये बच्चे लगे हैं।

'बालकनामा' को चलाने वाला एनजीओ 'चेतना' बच्चों के भविष्य की तलाश में अहम रोल अदा कर रहा है। असल में बालकनामा एक अखबार है जो बीते 10 साल से छप रहा है जिसे पूरी तरह से बच्चे ही चलाते हैं। इसके पीछे बच्चों का ही आइडिया है। वह अपनी बात कहना चाहते हैं।

क्या मोदी करेंगे इनके मन की बात

Childrens of Balaknama want meets to Modi

दूसरे बेघर बच्चों के साथ ज्योति भी इस अखबार में काम करती है। अखबारनामा में ज्योति जैसे बच्चों की ही कहानियां छपती हैं। संपादकीय बैठक भी होती है। बच्चों की टीम तय करती है कि पहले पन्ने पर कौन सा विषय होगा।

बड़े ख्वाब देखने वाले ये छोटे बच्चे अपने मन की बात कुछ यूं बयां करते हैं। गरीब और अमीर में क्या फर्क होता है। बालकनामा से जुड़े कुछ बच्चों का सपना है कि वो भी अपने सपनों की उड़ान भरें। 15 साल का चिंकू कहता है हमारे पास कोई पहचान नहीं थी। हम भी सम्मान के साथ जीना चाहते हैं। हमें गालियां नहीं भविष्य चाहिए।

16 साल की चांदनी और अखबार की सम्पादक ज्योति कहती हैं कि छोटे गरीब बच्चों के छोटे-छोटे सपने होते हैं जिन्हें पूरा किया जा सकता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 'मन की बात' से प्रभावित बालकनामा की टीम सात शहरों से बच्चों की आवाज सामने लाने की योजना बना रही है।

इनका कहना है कि एक दिन आएगा जब देश के प्रधानमंत्री सड़कों पर घूमते इन बच्चों की समस्याओं और उनके 'मन की बात' पर चर्चा जरुर करेंगे। ज्योति जैसे बच्चों को उम्मीद है कि एक दिन वह वाकई पेशेवर पत्रकार बन देश को बदलेंगे।

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