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मोबाइल की लत: मूड ठीक करने के लिए बच्चे ले रहे फोन का सहारा, फटकार के बाद भी नहीं बदल रहा व्यवहार

Mon, 28 Aug 2023 02:43 PM IST
श्याम जी. अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: श्याम जी. Updated Mon, 28 Aug 2023 02:43 PM IST
सार

मोबाइल पर बच्चों को अपनी उम्र और इच्छा के अनुरूप सामग्री आसानी से उपलब्ध हो रही है। यही कारण है कि मोबाइल की लत परिवार की फटकार के बाद भी छूट नहीं रही। 
 

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Children are taking support of phone to fix mood in delhi
सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : social media

विस्तार

स्कूल से लौटकर राहुल अपने कमरे में चला गया, मन उदास था। शायद किसी ने कुछ कह दिया। अपने दर्द को छिपाने के लिए फोन उठाया और वीडियो देखने लगा। राहुल अकेला ऐसा किशोर नहीं है जो अपने दर्द और खराब मूड को ठीक करने के लिए फोन का सहारा ले रहा है। विशेषज्ञ बताते हैं कि मोबाइल की लत इतनी गंभीर हो गई है कि मूड ठीक करने के लिए भी बच्चे मोबाइल का सहारा ले रहे हैं।

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नहीं छूट रही मोबाइल की लत
दावा किया जा रहा था कि लॉकडाउन के दौरान घर में बंद बच्चे स्कूल खुलने के बाद धीरे-धीरे अपनी जिंदगी में वापस लौट जाएंगे, लेकिन अस्पतालों में आ रहे ऐसे मरीजों का आंकड़ा जस का तस बन हुआ है। विशेषज्ञों की मानें तो मोबाइल पर बच्चों को अपनी उम्र और इच्छा के अनुरूप सामग्री आसानी से उपलब्ध हो रही है। यही कारण है कि मोबाइल की लत परिवार की फटकार के बाद भी छूट नहीं रही। 
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बच्चों के विकास को प्रभावित करता है मोबाइल
मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि बच्चों की उम्र के साथ उनके दिमाग में न्यूरॉन की संरचना भी बदलती है। मोबाइल की लत इन न्यूरॉन को नकारात्मकता में बदल देती है। इस कारण मोबाइल न मिलने पर बच्चों का व्यवहार तक बदल जाता है। लगातार मोबाइल देखने के कारण उनके मेटाबोलिक भी प्रभावित होते हैं जो उनके विकास को प्रभावित करता है। 
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एम्स में हर शनिवार को चलने वाली बिहेवियरल एडिक्शन क्लीनिक के प्रमुख डॉ. यतन पाल सिंह बल्हारा ने बताया कि क्लीनिक में आने वाले मरीजों की संख्या पहले की तरह बनी हुई है। इन बच्चों में मोबाइल की लत इस कदर तक हावी होती है कि परिजनों की बात तक सुनना पसंद नहीं करते। 

दिमाग देता है सिग्नल
डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल में मनोरोग विभाग के प्रोफेसर डॉ. लोकेश शेखावत ने कहा कि दिमाग बच्चों को सिग्नल देता है कि मोबाइल देखना ही खराब मूड को ठीक करने का सबसे बेहतर तरीका है। धीरे-धीरे यह आदत लत बन जाती है। बच्चों का जब विकास होता है तो उसमें न्यूरॉन बन रहे होते हैं और इस लत के कारण इनमें नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। ये अपने उम्र से बढ़कर व्यवहार करते हैं।

बिना मोबाइल के लगता है डर
इंदिरा गांधी अस्पताल के मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. अंकित दराल ने कहा कि मोबाइल की लत को नोमोफोबिया (मोबाइल के बिना डर) के रूप में जाना जाता है। ऐसा देखा गया है कि बच्चे बिना फोन के समय गुजार नहीं पाते। यह सीधे तौर पर बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य, संबंध और सामान्य कल्याण पर दुष्प्रभाव डाल रहे हैं।


यह हैं लक्षण
1. आधे घंटे से ज्यादा समय तक मोबाइल का इस्तेमाल करना।
2. बार-बार कहने पर फोन न रखना। 
3. डांटने या गुस्सा होने पर लड़ना।
4. खाना खाने के दौरान बार-बार मोबाइल देखना।
5. मोबाइल देखने के लिए रात को देर से सोना व जल्दी उठ जाना।

इसलिए करते हैं इस्तेमाल 
1. खराब मूड ठीक हो जाता है।
2. अपने दोस्तों से जुड़ पाते हैं।

पहुंच रहे हजारों मरीज  
एम्स, सफदरजंग, डॉ. राम मनोहर लोहिया, इंदिरा गांधी सहित दिल्ली के कई अस्पतालों में हजारों बच्चे मोबाइल की लत से परेशान होकर उपचार करवाने पहुंच रहे हैं। डॉक्टरों की मानें तो इनमें से अधिकतर बच्चे हिंसक हो जाते हैं, जबकि कई बच्चे खुद को नुकसान पहुंचा देते हैं। ऐसे बच्चे आगे चलकर और गंभीर बीमारी से पीड़ित हो जाते हैं।

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