किसान आंदोलन का कूड़ा उठा रहा मासूम बचपन, प्लास्टिक की बोतलें, गत्ते बेचकर कर रहे 100-150 रुपये की कमाई
- आनंद विहार रेलवे स्टेशन, बस अड्डे पर कूड़ा उठाने के लिए 30-40 हजार रुपये प्रति महीने तक का होता है ठेका, बच्चों को 200, महिलाओं को 300-400 रुपये की दिहाड़ी पर रखकर उठवाया जाता है कूड़ा
- नगर निगम के सफाई कर्मचारी, बस अड्डे के अधिकारियों की मिलीभगत से होता है ये काम
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किसान आंदोलन से परेशाान केंद्र सरकार चाह रही है कि यह प्रदर्शन जल्द से जल्द खत्म हो जाए और राजधानी की जिंदगी पटरी पर लौट सके। लेकिन इसी बीच कुछ लोग ऐसे भी हैं जो आंदोलन के जल्द खत्म न होने की दुआ कर रहे हैं। वे चाहते हैं कि आंदोलन ज्यादा से ज्यादा लंबा खिंचे और उनकी 'मौज' बनी रहे। ये कोई खालिस्तानी या देशद्रोही ताकतें नहीं हैं, जो देश को अस्थिर होते देख खुश हो रही हैं, बल्कि ये इसी देश के मासूम बच्चे हैं जो किसान आंदोलन में पैदा हो रहे कूड़े को बीनकर रोजाना सौ से डेढ़ सौ रुपये तक की कमाई कर रहे हैं।
लंबे लॉकडाउन में खाने के लिए भी तरस जाने के बाद यह उनके लिए 'मौज' ही है कि बिना गली-गली भटके एक ही जगह पर उन्हें ढेर सारा कूड़ा मिल रहा है और उन्हें ज्यादा कमाई का 'अवसर' मिल रहा है। साथ ही यहां चल रहे लंगर में उनको रोज पेट भरने को भी मिल रहा है जो उनके लिए किसी उत्सव से कम नहीं है।
असलम (बदला हुआ नाम) की उम्र आठ वर्ष है। वह मूल रूप से बिहार का रहने वाला है। उसकी उम्र भले ही स्कूल जाने की हो, लेकिन वह भी अपने मां-बाप के साथ यहां कमाई करने के लिए आया हुआ है। वह अपने तीन अन्य भाई-बहनों के साथ रोज यूपी गेट पर चल रहे किसानों के आंदोलन से प्लास्टिक की बोतलें, ग्लास, गत्ते के बने कार्टन और अन्य कूड़े का सामान बेचकर रोजाना सौ-डेढ़ सौ रुपये की कमाई कर रहा है। उसके दो अन्य साथी भी उसी की तरह कूड़ा उठा रहे हैं।
पूछने पर, असलम पहले तो संकोच करता है, लेकिन फिर बताता है कि कबाड़ी वाले भैया उससे पांच रुपये किलो के हिसाब से प्लास्टिक की बोतलें और ग्लास खरीद लेते हैं। गत्ते की क्वॉलिटी खराब हो तो दो से पांच रुपये और अच्छी हो तो 10 रुपये प्रति किलो खरीद लेते हैं। इस प्रकार उसे और उसके साथियों को रोजाना लगभग 100-150 रुपये की कमाई हो जाती है।
लॉकडाउन का असर उनकी इस जिंदगी पर भी पड़ा है जब कहीं भी कोई कूड़ा नहीं निकलता था। उस समय सरकार के चल रहे भोजन से ही उनकी जिंदगी चल रही थी। लेकिन अब लॉकडाउन खत्म हो जाने के बाद उसकी जिंदगी भी धीरे-धीरे 'पटरी' पर लौट रही है।
रेलवे स्टेशन-बस अड्डे का ठेका 30 से 40 हजार रुपये महीना
कूड़े के इस धंधे का एक दूसरा पक्ष भी है। रेलवे स्टेशन, बस अड्डे, मछली बाजार, मुर्गा मार्केट जैसी जिन जगहों पर ज्यादा और अच्छी क्वॉलिटी का कूड़ा मिलने की संभावना होती है, वहां पर सबको कूड़ा बीनने की अनुमति नहीं होती है। इन जगहों पर कूड़ा उठाने के लिए ठेका लेना पड़ता है, उसके बाद ही ठेका लेने वाला व्यक्ति अपने परिवार के साथ उस पूरी जगह का कूड़ा उठा सकता है।
आनंद विहार बस अड्डे पर कूड़ा उठाने की कीमत 30 से 40 हजार रुपये के लगभग प्रतिमाह का किराया चुकाना पड़ता है। आनंद विहार रेलवे स्टेशन का ठेका भी लगभग इसी कीमत के आसपास निकलता है। हालांकि, लॉकडाउन के बाद यात्रियों की संख्या में कमी के कारण इन कीमतों में कमी आई है। राजधानी की पॉश कॉलोनियों में भी कूड़ा उठाने के लिए एक निश्चित राशि का भुगतान करना पड़ता है। यह पैसा बिल्डिंग के सिक्योरिटी में लगे लोग आपस में ले लेते हैं। पैसा न देने पर वे कॉलोनी में कूड़ा उठाने के लिए किसी को अंदर जाने की अनुमति नहीं देते।
दिहाड़ी पर रखते हैं कूड़ा बीनने के लिए
बड़े रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों पर कूड़े का ठेका मिल जाने के बाद ठेकेदार कुछ बच्चों, महिलाओं को कूड़ा उठाने के लिए दिहाड़ी मजदूरी पर रखता है। बच्चों को कूड़ा बीनने के लिए 200 रुपये और महिलाओं को 300-400 रुपये प्रतिदिन तक का भुगतान किया जाता है। इसके अलावा कुछ ठेकेदार खुद भी अपने परिवार के साथ कूड़ा उठाने का काम करते हैं।
कौन लेता है ये पैसा
कूड़ा उठाने वाले एक व्यक्ति के अनुसार, बस अड्डों और रेलवे स्टेशनों पर सफाई करने वाले सरकारी कर्मचारी नियुक्त होते हैं, लेकिन वे कभी-कभी केवल ड्यूटी पूरी करने के लिए सफाई करने आते हैं। इन कर्मचारियों, बस अड्डे, रेलवे स्टेशन के कुछ अधिकारियों की मिली भगत से कूड़ा उठाने के लिए इस तरह की वसूली की जाती है।
दूसरे के इलाके में नहीं उठा सकते कूड़ा
कूड़ा उठाने वाली एक अन्य महिला नाजनीन ने बताया कि कूड़े उठाने वालों में एरिया बंटा हुआ होता है। कोई भी कूड़ा बीनने वाला किसी दूसरे की एरिया में नहीं जाता है। ऐसा करने पर कई बार मामला मारपीट तक पहुंच जाता है।
असलम की मां रोशनी (बदला हुआ नाम) ने अमर उजाला को बताया कि वे अपने पति और बच्चों के साथ मिलकर कूड़ा बीनने का काम करती हैं। पूरे परिवार को मिलाकर रोजाना 800-1000 रुपये तक की कमाई हो जाती है। वे गाजीपुर सब्जी मंडी के पास बनी झुग्गियों मेें रहती हैं। बच्चों की पढ़ाई का कोई इंतजाम नहीं है।
आंगनबाड़ी केंद्रों के खुलने पर बच्चे भोजन की उम्मीद में वहां चले जाते थे, लेकिन कोरोना काल में आंगनबाड़ी केद्र भी पूरी तरह बंद हैं, तो बच्चे भोजन की उम्मीद में इन किसान आंदोलनों, धरने-प्रदर्शनों और अन्य भीड़भाड़ वाले कार्यक्रमों के भरोसे चल रहे हैं।