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Delhi NCR News: पर्दे के पीछे नेतृत्व करने वालों की भूमिका पर पुस्तक का विमोचन
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संवाद न्यूज एजेंसी
नई दिल्ली। संस्थान की सफलता केवल शीर्ष पद पर बैठे व्यक्ति के नेतृत्व से तय नहीं होती, बल्कि पर्दे के पीछे जिम्मेदारियां संभालने वाले नेतृत्वकर्ताओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। इसी विचार पर लेखक मनोज मदान की पुस्तक डिप्टी सेकेंड टू नन का विमोचन इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में किया गया। वॉलनट प्रकाशन की ओर से प्रकाशित यह पुस्तक कॉरपोरेट जगत में दूसरे और तीसरे स्तर पर कार्य करने वाले पेशेवरों की जिम्मेदारियों, योगदान और नेतृत्व क्षमता पर केंद्रित है।
पुस्तक में उन पेशेवरों की भूमिका को सामने लाने का प्रयास किया गया है, जो शीर्ष पद पर न होते हुए भी संस्थानों की कार्यप्रणाली और सफलता में अहम योगदान देते हैं। कार्यक्रम में नैसकॉम की संगीता गुप्ता, चरनजोत सिंह नंदा, एसआरसीसी की डॉ. अरुणा झा, ईवाईजीडीएस के सर्वेश माथुर, अजय बग्गा, हरे कृष्ण आंदोलन से जुड़ी भूरीजना दास और पूनम मदान सहित कई अतिथि मौजूद रहे।
मनोज मदान ने कहा कि किसी व्यक्ति का प्रथम स्थान पर होना जरूरी नहीं है, फिर भी वह किसी से कम नहीं हो सकता। पुस्तक ऐसे पेशेवरों के योगदान को रेखांकित करती है, जो पर्दे के पीछे रहकर संस्थानों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
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नई दिल्ली। संस्थान की सफलता केवल शीर्ष पद पर बैठे व्यक्ति के नेतृत्व से तय नहीं होती, बल्कि पर्दे के पीछे जिम्मेदारियां संभालने वाले नेतृत्वकर्ताओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। इसी विचार पर लेखक मनोज मदान की पुस्तक डिप्टी सेकेंड टू नन का विमोचन इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में किया गया। वॉलनट प्रकाशन की ओर से प्रकाशित यह पुस्तक कॉरपोरेट जगत में दूसरे और तीसरे स्तर पर कार्य करने वाले पेशेवरों की जिम्मेदारियों, योगदान और नेतृत्व क्षमता पर केंद्रित है।
पुस्तक में उन पेशेवरों की भूमिका को सामने लाने का प्रयास किया गया है, जो शीर्ष पद पर न होते हुए भी संस्थानों की कार्यप्रणाली और सफलता में अहम योगदान देते हैं। कार्यक्रम में नैसकॉम की संगीता गुप्ता, चरनजोत सिंह नंदा, एसआरसीसी की डॉ. अरुणा झा, ईवाईजीडीएस के सर्वेश माथुर, अजय बग्गा, हरे कृष्ण आंदोलन से जुड़ी भूरीजना दास और पूनम मदान सहित कई अतिथि मौजूद रहे।
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मनोज मदान ने कहा कि किसी व्यक्ति का प्रथम स्थान पर होना जरूरी नहीं है, फिर भी वह किसी से कम नहीं हो सकता। पुस्तक ऐसे पेशेवरों के योगदान को रेखांकित करती है, जो पर्दे के पीछे रहकर संस्थानों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
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