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Delhi NCR News: एमसीडी स्थायी समिति पर भाजपा का यू-टर्न, खुद ही बनाई व्यवस्था को किया पंगु

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sat, 04 Apr 2026 12:36 AM IST
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31 मार्च तक सीमित किया कार्यकाल, अब चुनाव तक नहीं हो सकेंगी बैठकें
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2008 में खुद भाजपा ने दिलाया था निरंतर कामकाज का अधिकार
विनोद डबास
नई दिल्ली। एमसीडी की स्थायी समिति को लेकर भाजपा की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आम आदमी पार्टी के शासनकाल में एमसीडी की सबसे अधिक अधिकार वाली इस समिति का गठन नहीं होने पर भाजपा हमेशा सवाल उठाती थी। मगर गत वर्ष सत्ता में आने के बाद उसी स्थायी समिति को खुद भाजपा ने पंगु बना दिया है। स्थायी समिति के गठन की प्रक्रिया शुरू होते ही भाजपा ने चुपचाप सदन में एक प्रस्ताव पारित कर उसका कार्यकाल 31 मार्च तक सीमित कर दिया। इस फैसले का अब खुलासा हुआ है। इस तरह समिति का कामकाज पूरी तरह ठप हो गया और नई समिति का चुनाव नहीं होने तक कोई बैठक संभव नहीं है। इससे एमसीडी के अहम वित्तीय और प्रशासनिक फैसले कम से कम दो माह अधर में लटके रहेंगे।
स्थायी समिति एमसीडी की सबसे शक्तिशाली इकाई मानी जाती है, जो बड़े खर्चों, टेंडर और नीतिगत फैसलों को मंजूरी देती है। ऐसे में इसका निष्क्रिय होना सीधे तौर पर एमसीडी के कामकाज को प्रभावित करता है और विकास कार्यों की रफ्तार पर भी असर डाल सकता है। इस प्रकरण पर सबसे बड़ा सवाल भाजपा की नीतिगत स्थिरता और मंशा को लेकर उठ रहा है। वर्ष 2008 में जब भाजपा नेता विजेंद्र गुप्ता स्थायी समिति के अध्यक्ष थे, तब इसी तरह की स्थिति में उन्होंने खुद यह सुनिश्चित कराया था कि समिति का कामकाज बाधित न हो। उस समय एमसीडी ने सॉलिसिटर जनरल से कानूनी राय ली थी, जिसमें साफ कहा गया था कि स्थायी समिति का कार्यकाल उसके गठन की तारीख से एक वर्ष पूरा होने तक रहेगा और तब तक समिति अपने सभी अधिकारों का इस्तेमाल कर सकती है।
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कानूनी राय में डीएमसी एक्ट की धारा 45(2) का हवाला देते हुए स्पष्ट किया गया था कि नई समिति के गठन तक पुरानी समिति की बैठकें जारी रह सकती हैं। तत्कालीन महापौर आरती मेहरा ने भी सदन में यही निर्देश दिए थे कि अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव होने तक समिति की बैठकें चलती रहेंगी। इस व्यवस्था को सभी वार्ड और विशेष समितियों पर भी लागू किया गया था। इसके बाद विजेंद्र गुप्ता ने आगामी वित्तीय वर्ष में समिति की बैठक की थी। इसके उलट, मौजूदा समय में भाजपा ने उसी व्यवस्था को नजरअंदाज करते हुए स्थायी समिति का कार्यकाल 31 मार्च तक सीमित कर दिया, जबकि समिति का गठन 12 जून 2025 को हुआ था। इस कारण वह 11 जून तक कार्य कर सकती थी। सवाल उठ रहा है कि भाजपा ने जानबूझकर समिति को निष्क्रिय करने का रास्ता क्यों चुना। इसको लेकर समिति के सदस्य ही नहीं, बल्कि भाजपा के अन्य कई पार्षद भी नाराज हैं।
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