जिनपर की राजनीति, उन्हीं के हाथ रह गए खाली
भाजपा की सूची जारी होने के बाद दिल्ली में रहने वाले प्रवासी खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं। पूर्वांचल और उत्तराखंड के निवासियों की नाराजगी सबसे अधिक देखने को मिल रही है।
वे इस बात को लेकर हैं नाराज है कि संख्या के आधार पर उन्हें पार्टी ने तरजीह नहीं दी। इतना ही नहीं वैसे लोगों को टिकट दे दिया है जो सदस्यता अभियान में भी सक्रिय नहीं रहे। इस बार पूर्वाचलियों को 70 सीटों में से महज 2 प्रत्याशियों को टिकट मिला है तो उत्तराखंड से ताल्लुकात रखने वाले को महज एक।
दलों के सर्वे को अगर आधार मानें तो 70 विधानसभा में 27 सीट ऐसी हैं, जहां पूर्वांचली मतदाताओं की तादाद 20-38 प्रतिशत है। पूर्वी दिल्ली इलाके के 13 विधानसभा क्षेत्रों में पूर्वांचली वोटरों का दबदबा है। लेकिन यहां से किसी को टिकट नहीं मिला है। सर्वे के मुताबिक उत्तरी और दक्षिणी दिल्ली में 38 फीसदी पूर्वांचली हैं।
उत्तराखंडियों की बात करें तो दिल्ली में इनकी संख्या भी कम नहीं है। उत्तराखंड के नेताओं का कहना है कि 20-22 लाख मतदाता उत्तराखंड के हैं। बुराड़ी करावल नगर, मुस्तफाबाद, पालम, द्वारका, पटपड़गंज, लक्ष्मीनगर, नई दिल्ली और कस्तूरबा नगर विधानसभा में इनकी अच्छी तादाद है। लेकिन पार्टी ने सिर्फ करावल नगर से एक टिकट दी है।
इन्हें किया नजरअंदाज, दलबदलुओं को दिए टिकट
एमसीडी के पूर्व चेयरमैन और भाजपा नेता जगदीश ममगाई कहते हैं कि भाजपा ने प्रवासियों को पूरी तरह नजरअंदाज किया है। पूर्वांचल व उत्तराखंडी मूल के नेताओं की उपेक्षा की गई है।
दलबदलुओं को महत्व दिया गया है। पूर्वांचलियों को दो और उत्तराखंडी को एक टिकट देना खानापूर्ति है। पिछले 35 वर्ष में यह पहली बार है कि मंडल, जिला व प्रदेश पदाधिकारियों से प्रत्याशियों के चयन में राय तक नहीं ली गई।
वहीं दिल्ली प्रदेश सह संयोजक, उत्तराखंड प्रकोष्ठ बीजेपी के विजय ढोंढियाल ने कहा है कि सदस्यता अभियान में जिसने भाग लिया उसे पार्टी ने तरजीह नहीं दी। दिल्ली की एक दर्जन सीट पर उत्तराखंड के लोगों का प्रभाव है, लेकिन पार्टी हर बार दरकिनार करती है। जबकि न केवल उत्तराखंड बल्कि दिल्ली में रहने वाले उत्तराखंड के लोग भाजपा के लिए शुरू से समर्पित हैं।