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हर्षवर्धन के सामने हैं ये पांच बड़ी चुनौतियां

Thu, 20 Feb 2014 04:54 PM IST
नवनीत शरण/अमर उजाला, नई दिल्ली
नवनीत शरण/अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Thu, 20 Feb 2014 04:54 PM IST
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bjp delhi president harsh vardhan will face five challenges
पार्टी के अध्यक्ष डॉ. हर्षवर्धन के सामने अब न केवल कांग्रेस पार्टी की चुनौती है, बल्कि नई पार्टी के रूप में आम आदमी पार्टी सबसे बड़ी चुनौती है।
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इतना ही नहीं भाजपा के भीतर ही इतने गुट हैं कि उससे भी पार पाना आसान नहीं है।

इसके साथ ही गठबंधन की राजनीतिक जिम्मेदारी निभाना भी प्रदेश अध्यक्ष के सामने चुनौती होगी।

मोदी का रथ रुका तो हर्षवर्धन होंगे जिम्मेदार

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राजनीतिज्ञ यह मानते हैं कि नरेंद्र मोदी का अगर विजयी रथ कहीं थमा है तो वह दिल्ली ही है, आप दिल्ली में ही सबसे बड़ी चुनौती है और विधानसभा में अपनी धमक छोड़ भाजपा के लिए मुसीबत खड़ी की है।

ऐसे में अगर लोकसभा चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन ठीक नहीं रहा तो ये जिम्मेदारी भी प्रदेश अध्यक्ष पर ही जाएगी।

वैसे ही विधानसभा चुनाव में पार्टी का बेहतर प्रदर्शन डॉ. हर्षवर्धन के नेतृत्व में हुआ नहीं माना जाता है।

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गठबंधन में तालमेल बैठाना होगी चुनौती

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उधर, कांग्रेस के जनाधार को भी तोड़ना भाजपा के लिए अहम है। क्योंकि लोकसभा चुनाव में सातों सीट पर कांग्रेस के ही सांसद हैं।

दूसरी तरफ शिरोमणि अकाली दल बादल गुट ने भी पहली बार विधानसभा में तीन सीट जीत दर्ज की हैं। लोकसभा की सात सीट में एक सीट पर अपनी दावेदारी भी पेश कर रही है। लिहाजा उनसे गठबंधन के तहत तालमेल बैठाना भी चुनौती है।

प्रदेश भाजपा की गुटबाजी जगजाहिर है। ऐसे में प्रदेश अध्यक्ष की जब नई टीम गठित होगी तो पार्टी के भीतर ही विरोध के सुर उठना शुरू होगा। क्योंकि यहां भी संघ अपना दबदबा रखेगा और ज्यादातर पदाधिकारी संघ के निर्देश पर ही चुने जाएंगे। ऐसे में तालमेल बैठाना भी अध्यक्ष की जिम्मेदारी होगी।

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पंजाबी लॉबी को संतुष्ट करना भी मुश्किल

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दिल्ली की राजनीति अभी तक दो ध्रुव पर चलती है- वैश्य और पंजाबी लॉबी। पार्टी आलाकमान भी इन्हीं दोनों वर्ग को बराबर बड़ा पद देकर चेक एंड बैलेंस की स्थिति रखता है।

लेकिन प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी हर्षवर्धन को देकर पंजाबी लॉबी को निराश कर दिया है। अभी तक यही देखने को मिला है कि जब वैश्य समाज के नेता अध्यक्ष की कुर्सी संभालते थे तो विधानसभा नेता प्रतिपक्ष के पद पर कोई न कोई पंजाबी समाज का ही नेता होता था।

पिछले तीन बार से प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी पर वैश्य समाज के डॉ. हर्षवर्धन, विजेंद्र गुप्ता, विजय गोयल को नियुक्त किया गया था तो विधानसभा में पंजाबी समाज के प्रो. वीके मल्होत्रा इस पद पर थे। लेकिन इस बार दोनों पद पर वैश्य समाज से जुड़े डॉ. हर्षवर्धन ही हैं।

हर फैसला माना जाएगा संघ का फरमान

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भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व ने हर्षवर्धन को अब फ्री हैंड दे दिया है। वे विधायक दल के नेता तो हैं ही अब संगठन संभालने की भी जिम्मेदारी उनके ऊपर है।

ऐसे में अब हर्षवर्धन अगामी लोकसभा चुनाव में मजबूती के साथ फैसला ले सकेंगे। प्रदेश चुनाव समिति में भी उनका अहम रोल होगा।

साथ ही यह भी फैक्ट है कि हर्षवर्धन संघ के चहेते हैं लिहाजा उनका हर फरमान संघ का फरमान माना जाएगा।

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