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हरियाणा में भाजपा-जजपा गठबंधन पर किसान आंदोलन की चोट, दबाव में आ रहे चौटाला !
Mon, 11 Jan 2021 01:22 AM IST
संजीव कुमार झा
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: संजीव कुमार झा
Updated Mon, 11 Jan 2021 01:22 AM IST
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दुष्यंत चौटाला
- फोटो : File
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किसान आंदोलन को लेकर रविवार का दिन, खासतौर पर हरियाणा की राजनीति के लिए अहम रहा है। नाराज किसानों ने करनाल के कैमला गांव में मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर की महापंचायत नहीं होने दी। सीएम का हैलीकॉप्टर नहीं उतरने दिया गया, जबकि करनाल लोकसभा सीट भाजपा के पास है और खुद मुख्यमंत्री खट्टर करनाल विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीते हैं। इसके बावजूद उन्हें किसानों का तगड़ा विरोध झेलना पड़ा है।राजनीतिक जानकारों का कहना है कि हरियाणा में भाजपा जजपा गठबंधन पर किसान आंदोलन की गहरी चोट पड़ी है।
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किसानों की राजनीति करने वाले बड़े नामों में शुमार रहे भूतपूर्व उपप्रधानमंत्री स्वः चौ. देवीलाल के परिवार से आने वाले डिप्टी सीएम दुष्यंत चौटाला अब इस घटना के बाद दबाव में आ गए हैं।अगर किसान आंदोलन लंबा खिंचता है तो जजपा अध्यक्ष दुष्यंत चैटाला पर यह दबाव बढ़ता जाएगा कि प्रदेश में उनकी पार्टी भाजपा सरकार को समर्थन जारी रखे या वापस लेने की घोषणा करे।
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प्रदेश की राजनीति के जानकार चंद्रप्रकाश बताते हैं, प्रदेश में जब भाजपा और जजपा का गठबंधन हुआ था तो उस वक्त भी जजपा के वोटर इसे लेकर खुश नहीं थे। वजह, जजपा का वोट बैंक ज्यादातर ग्रामीण क्षेत्रों में है।इसमें भी कृषक वर्ग के लोगों की अच्छी खासी तादाद रही है। हो सकता है कि उस वक्त भाजपा सरकार को समर्थन देना दुष्यंत चौटाला की मजबूरी रही हो। हरियाणा में करीब डेढ़ दशक से चौटाला परिवार सत्ता से बाहर रहा था।दुष्यंत के पास एक मौका था कि वे खट्टर सरकार में शामिल होकर अपनी पार्टी को मजबूती प्रदान कर सकते हैं।
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हालांकि उसके बाद भाजपा को समर्थन देना चौटाला समर्थकों को रास नहीं आया।नतीजा, दुष्यंत चैटाला के प्रचार करने के बावजूद बड़ोदा विधानसभा का उपचुनाव भाजपा हार गई। उसके बाद पिछले दिनों हुए तीन नगर निगम, तीन नगरपालिका और एक नगर परिषद के चुनाव में भाजपा को पांच जगहों पर हार का सामना करना पड़ा।जजपा के हाथ पूरी तरह खाली रहे। दिसंबर में दुष्यंत चौटाला ने दिल्ली में जब किसानों की मांगों को लेकर केंद्रीय मंत्रियों से बातचीत की तो उन्होंने नपा तुला बयान दिया था। दुष्यंत ने कृषि बिलों को लेकर कुछ कहने की बजाए एमएसपी पर ही सारा जोर दे दिया। उन्होंने कहा कि एमएसपी के साथ कुछ छेड़छाड़ हुआ तो पहला त्यागपत्र दुष्यंत चौटाला का होगा।
इसके बाद जब कभी उनका बयान आया तो वह यही होता था कि किसान संगठनों के साथ बातचीत हो रही है। उनके साथ गलत नहीं होने देंगे।मामले का समाधान निकलेगा।अब किसान आंदोलन धीरे धीरे उग्र स्थिति की तरफ जा रहा है तो दुष्यंत चौटाला चुप हैं। शोधार्थी रविंद्र कुमार के मुताबिक, किसान आंदोलन का नुकसान भाजपा और जजपा, दोनों को हो रहा है। दुष्यंत को यह बात समझनी होगी कि उनका मुख्य वोट बैंक तो किसान ही है।अगर अब वे इनके समर्थन में खुलकर सामने नहीं आते हैं तो आगामी चुनाव में किसान समुदाय की नाराजगी उनके लिए राजनीतिक नुकसान का सबब बन सकती है। उपचुनाव और स्थानीय निकाय के रिजल्ट यह समझने के लिए काफी हैं कि प्रदेश में भाजपा व जजपा के लिए माहौल संतोषजनक नहीं है।
कृषि बिलों को लेकर आंदोलन कर रहे किसानों को खालिस्तान से जोड़ना और कथित तौर पर भाजपा समर्थक कुछ किसान संगठनों के नेताओं को केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के पास भेजना, इन सब बातों से हरियाणा का किसान समुदाय और अधिक नाराज हो गया। जानकारों के मुताबिक, किसानों को मंत्री के पास भेजने की रणनीति मुख्यमंत्री खट्टर की बताई गई है।उन्होंने ही आंदोलन को लेकर खालिस्तान से जुड़ा बयान दिया था।खट्टर ने कहा था कि समय आने पर वे इसका खुलासा करेंगे।
अगर किसान समुदाय की बात करें तो मौजूदा स्थिति में भाजपा और जजपा, दोनों को भारी नुकसान पहुंच रहा है। ये संभावित है कि दोनों पार्टियां इस बात को लेकर किसानों के विरोध की ज्यादा चिंता नहीं कर रही कि विधानसभा चुनाव अभी दूर यानी 2024 में है। जब केंद्र सरकार लगातार किसानों से बात कर रही तो हरियाणा के भाजपा नेता किसानों पर निशाना साध रहे थे।भाजपा नेता जेपी दलाल ने तो इतना कह दिया था कि इस आंदोलन की आड़ में चीन और पाकिस्तान भारत में अशांति पैदा करना चाहते हैं।