विधानसभा चुनाव बिहार में, रंग चढ़ने लगा गाजियाबाद में
- बिहार से छन छन कर आ रहीं सूचनाएं कि कौन कहां से लड़ेगा
- बिहार निवासियों के बीच चुनावी चर्चा में उठाए जा रहे हैं बाढ व अन्य मुद्दे
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
बिहार विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। तारीखों की घोषणा होते ही गाजियाबाद में रह रहे बिहार निवासी उत्साहित हो गए हैं। अपनी मिट्टी पर अपने पसंद का नेता चुनने को लेकर टीएचए से बिहार के बीच फोन की घंटियां घनघना उठीं हैं। छन छन कर बिहार से सूचनाएं आ रही हैं कि कौन कहां से लड़ेगा। तय किया जाने लगा है कि किसको सपोर्ट करना है किसको नहीं।
सोसायटियों में रह रहे लाखों बिहार निवासियों की चाहत है कि इस बार युवाओं को चुना जाए चाहे वह किसी भी पार्टी के हों। युवाओं की बागडोर से इन्हें बिहार बदलने की उम्मीद है। इसी के साथ विभिन्न दलों के नेता टीएचए में रह रहे बिहार के वोटरों को रिझाने में लग गए हैं। वर्चुअल मीटिंग ही इस बार चुनाव प्रचार का मुख्य साधन होगा।
वैसे तो गाजियाबाद में बिहार के विभिन्न इलाके के लोग रहते हैं लेकिन इसमें मिथिलांचल और मध्य बिहार के लोग ज्यादा हैं। सीता जी का जन्मस्थली मानी जानी वाली मिथिलांचल की धरती पर कांग्रेस के समय से ही नामी गिरामी नेता पैदा हुए। वहीं यहां के लोग भी राजनीतिक रूप से सजग हैं।
सहरसा, दरभंगा, सीतामढी, मोतिहारी, मुजफ्फरपुर, बेगुसराय, समस्तीपुर आदि के यहां रह रहे लोगों को इस बार मिथिलांचल में चौंकाने वाली रिजल्ट की आशा है। कई बिहार निवासियों का कहना है कि बिहार के इलाकों में अभी कोशी समेत अन्य नदियों के तांडव का निशान अभी मिटा नहीं है। इस तांडव का जवाब लोग चुनाव में चाहेंगे।
कोराना काल में इलाज नहीं मिलने की शिकायत आम है। वहीं मध्य बिहार के आरा, बक्सर, छपरा, सीवान, गोपालगंज और पटना के आसपास के इलाके के लोग इस चुनाव में युवा चेहरे को चुनने की बात करते हैं। यहां भी बाढ, कोरोना समेत कई स्थानीय मुद्दे हैं जो इस चुनाव में मत का आधार बनेंगे।
लहराएंगे कोशी और कोरोना के मुद्दे
टीएचए की सोसायटियों में रह रहे लोगों को कहना है कि इस बार के चुनाव में कोशी और कोरोना के मुद्दे को लेकर उनकी रुचि और बढ गई है। यह भी उनके लिए रोचक है कि कोरोना काल में चुनाव का क्या रंग होगा। एक मोटे अनुमान के अनुसार इंदिरापुरम में करीब डेढ़ लाख लोग बिहार के मूल निवासी हैं। वसुंधरा, वैशाली, कौशांबी और मोहननगर के में लाखों की संख्या में बिहार के लोग रहते हैं। इनके बीच अभी से कोशी और कोरोना का मुद्दा लहराया जा रहा है। सोसायटी वासियों का कहना है कि जीत और हार से उन्हें मतलब नहीं है, उन्हें अच्छे उम्मीदवार की दरकार है।
मानसी जंक्शन से आगे बढ़ते ही हमारी ट्रेन बड़ी पटरी से छोटी पटरी पर आ जाती थी। अब कुछ वर्षों से बड़ी पटरी पर ट्रेन चलने लगी है लेकिन पटरी के दोनों ओर के दृश्य नहीं बदले हैं। सिमरी बख्तियारपुर पहुंचने के पहले तक दोनों ओर समुंदर की तरह कोशी नदी का विकराल रूप दिखता है। कोशी कछार के लोगों का जीवन आज तक नहीं बदला। वसुंधरा में बैठकर यही सोचती रहती हूं कि कब यहां के लोगों को तन भर कपड़ा और पेट भर रोटी मिलेगी। कोशी के कछार पर विकास का बयार देख सकने की उम्मीद से इस बार के चुनाव में बिहार जाउंगी।
रीता सिंह
मैंने दो बार बिहार में बिजनेस करने की कोशिश की। पूर्णिया में प्लांट लगाना चाहा। पर यह संभव नहीं हो सका लेकिन उम्मीद अभी भी है। इसके लिए जरूरत है कि चुनाव में युवा चेहरों का तवज्जो दी जाए, चाहे वह किसी पार्टी के हो। स्थानीय विधायक का क्षेत्र में विकास का लेकर बड़ा रोल होता है। लिहाजा, इस बार मैं वोट डालने से लेकर प्रचार करने तक को बिहार जाउंगा।
अमित विक्रम
कोरोना काल में बहुत से लोग टीएचए से बिहार चले गए। खासकर आर्थिक रूप से पिछड़े लोग अब बिहार से लौटकर यहां आना भी नहीं चाहते। इनका अपनी मिट्टी पर ही जमने के लिए चुनाव एक सुनहरा मौका के रूप में आया है। चुनाव का सदुपयोग करते हुए ये अपने हित में बेहतर उम्मीदवार का चयन कर कर सकते हैं। इनके समर्थन में मैं आगे बढकर काम करूंगी।
रश्मि सिंह
हमलोग हर बार बिहार चुनाव में वोट डालने से लेकर प्रचार करने तक को बिहार जाते हैं। इस बार कोराना के चलते स्थितियां बदली हुई हैं लेकिन लोकतंत्र के इस पर्व को हर हाल में जीना चाहते हैं। सो, खोड़ा से बिहार जाएंगे ही। वहां बेहतर उम्मीदवार को चुनने का माहौल बनाएंगे। वर्चुअल मीटिंग की शुरुआत हो चुकी है जिसमें हम बेहतर बिहार की बात कर रहे हैं।