केदारनाथ सिंह दिल्ली में करीब चार दशक से ज्यादा समय से रहते हुए भी ग्रामीण संवेदना के कवि बने रहे। छल-बल की इस राजधानी में भी उन्होंने अपने आस-पास गंगा-सरयू के दोआबे का एक गांव बसा लिया था।
यह गांव उनकी चेतना में बसता था। इस गांव से संबंध बनाए रखने के लिए वे बार-बार स्मृतियों में जाते रहे। सहज ग्रामीण संवेदना उन्हें एक विशिष्ट काव्य-दृष्टि देती थी। इस काव्य-दृष्टि का ही कमाल था कि बरामदे में रखी हुई कुदाल पर एक शानदार कविता लिख सकते थे।
उनकी कविता में आते ही कुदाल सिर्फ एक भौतिक वस्तु नहीं रह जाती, बल्कि एक चुनौती बन जाती है। कवि की दृष्टि कुदाल की भौतिक उपस्थिति को श्रमजीवी वर्ग की उपेक्षा और विक्षोभ का प्रतीक बना देती।
कुदाल, जिसका कद सदी के इस अंधकार में धीरे-धीरे बढ़ रहा है और जिसे दरवाजे पर छोड़ना खतरनाक है, सड़क पर रख देना असंभव और आभिजात्य घर में जिसके लिए कोई जगह नहीं है। ऐसे में उस कुदाल का क्या किया जाए, यह एक बहुत बड़ा प्रश्न बन जाता है।
केदार जी की कविता में यह धार लोकजीवन से उनके जुड़ाव की वजह में आई, जहां चीजों के साथ लोगों के संबंध बड़े रागात्मक होते हैं। मानसून की प्रथम बौछार के बाद जब पहली बार खेत में हल भेजा जाता है तो उसकी पूजा की जाती है। यही वे संस्कार हैं जो चकिया(बलिया) के गोबर से लीपे आंगन से दिल्ली के आधुनिक या उत्तर आधुनिक जीवन तक केदार जी का पीछा करते रहे।