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खास खबर: रिफाइंड, वनस्पति घी और परफ्यूम...बस हो गया ‘देशी घी’ तैयार
Mon, 12 Oct 2020 12:10 PM IST
प्राची प्रियम
कैलाश गठवाल, बल्लभगढ़
कैलाश गठवाल, बल्लभगढ़
Published by: प्राची प्रियम
Updated Mon, 12 Oct 2020 12:10 PM IST
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desi ghee
फरीदाबाद के बल्लभगढ़ शहर के राजा नाहर सिंह द्वार या बस अड्डे चौकी के पास की एंट्री किसी भी रास्ते से बाजार में हो, आपको काउंटर पर ही सफेद रंग की थैलियां नजर आ जाएंगी। ये थैलियां किसी और चीज की नहीं बल्कि मिलावटी रसायन की होती हैं, जिन्हें ‘शुद्ध देशी घी’ बताकर बेचा जा रहा है।
बल्लभगढ़ में यह धंधा आसपास के सभी बाजारों से ज्यादा है। त्योहारी सीजन में यहां से बना हुआ मिलावटी घी अन्य जिलों तक भी भेजा जाता है। इसकी कीमत इतनी कम होने के बावजूद भी लोग यह तय नहीं कर पाते कि इस रेट में शुद्ध घी कैसे मिल सकता है। इस बात की पड़ताल अमर उजाला टीम ने की।
दरअसल, घी को इस तरह से तैयार किया जाता है कि पहचान करना आसान नहीं होता। इसकी खुशबू, रंग व दाना सभी बिल्कुल देशी घी के जैसा ही होता है। बाजार में इसकी कीमत 120 रुपये से शुरू होकर 150 रुपये तक है।
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यह दुकान की लोकेशन पर भी निर्भर करता है। बस अड्डा पुलिस चौकी के पास एक दुकान में बड़े से प्लास्टिक के टोकरे में थैलियां भर के रखी रहती हैं, जिनका वजन एक किलो होता है। दुकान मालिक से उसके बारे में पूछने पर वह उसे अनट्रस्टीफाइड फैट बताते हैं, यानी एक आम आदमी जिसे समझ ही न सके।
इसके बाद शुरू होता है उसे ‘घी’ कहकर बेचने का काम। अलग-अलग पैकिंग जिसमें लिखा है सबसे असली सबसे देशी। लेकिन यहां घी शब्द को छिपा लिया जाता है। ज्यादातर ग्रामीण इलाके के लोग पूरी बात को समझे बिना ही इसे खरीद लेते हैं।
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बल्लभगढ़ में यह धंधा आसपास के सभी बाजारों से ज्यादा है। त्योहारी सीजन में यहां से बना हुआ मिलावटी घी अन्य जिलों तक भी भेजा जाता है। इसकी कीमत इतनी कम होने के बावजूद भी लोग यह तय नहीं कर पाते कि इस रेट में शुद्ध घी कैसे मिल सकता है। इस बात की पड़ताल अमर उजाला टीम ने की।
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दरअसल, घी को इस तरह से तैयार किया जाता है कि पहचान करना आसान नहीं होता। इसकी खुशबू, रंग व दाना सभी बिल्कुल देशी घी के जैसा ही होता है। बाजार में इसकी कीमत 120 रुपये से शुरू होकर 150 रुपये तक है।
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यह दुकान की लोकेशन पर भी निर्भर करता है। बस अड्डा पुलिस चौकी के पास एक दुकान में बड़े से प्लास्टिक के टोकरे में थैलियां भर के रखी रहती हैं, जिनका वजन एक किलो होता है। दुकान मालिक से उसके बारे में पूछने पर वह उसे अनट्रस्टीफाइड फैट बताते हैं, यानी एक आम आदमी जिसे समझ ही न सके।
इसके बाद शुरू होता है उसे ‘घी’ कहकर बेचने का काम। अलग-अलग पैकिंग जिसमें लिखा है सबसे असली सबसे देशी। लेकिन यहां घी शब्द को छिपा लिया जाता है। ज्यादातर ग्रामीण इलाके के लोग पूरी बात को समझे बिना ही इसे खरीद लेते हैं।
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डिब्बे में है तो कीमत डबल
दुकानदार के एक कारिंदे ने बताया कि उनकी बड़ी वर्कशॉप है और इस थैली के सामान को खुद ही तैयार करते हैं। मुख्य बाजार में इस तरह की दर्जन भर से ज्यादा दुकानें हैं। बाकी दुकान मुख्य से थोड़ा अंदर भी हैं।
थोड़ी और जानकारी निकालने पर पता चला कि कई डिब्बा बंद पैकिंग में भी यही सामान बेचा जाता है। बस पैकिंग होने पर भाव डबल हो जाता है। ज्यादातर शादी व बड़े आयोजनों में यह ‘घी’ सबसे ज्यादा इस्तेमाल में लाया जाता है।
कैसे होता है तैयार
वर्कशॉप में काम कर चुके एक पूर्व कारीगर ने बताया कि इसे बनाने में कोई खास मेहनत या तकनीक की जरूरत नही होती। इसमें 60 प्रतिशत वनस्पति व 40 प्रतिशत सोया रिफाइंड होता है। वनस्पति व सोया रिफाइंड को एक साथ गर्म किया जाता है।
इसके बाद इसमें खुशबू के लिए एक परफ्यूम मिलाया जाता है, जिससे देशी घी जैसी खुशबू आती है। इसके साथ ही अब एक और तरल मिलाया जाता है, जिससे इसमें दाना बन जाता है। बस आपका ‘देशी घी’ तैयार है। अब इसे ठंडा करके थैलियों में भर लिया जाता है।
थोड़ी और जानकारी निकालने पर पता चला कि कई डिब्बा बंद पैकिंग में भी यही सामान बेचा जाता है। बस पैकिंग होने पर भाव डबल हो जाता है। ज्यादातर शादी व बड़े आयोजनों में यह ‘घी’ सबसे ज्यादा इस्तेमाल में लाया जाता है।
कैसे होता है तैयार
वर्कशॉप में काम कर चुके एक पूर्व कारीगर ने बताया कि इसे बनाने में कोई खास मेहनत या तकनीक की जरूरत नही होती। इसमें 60 प्रतिशत वनस्पति व 40 प्रतिशत सोया रिफाइंड होता है। वनस्पति व सोया रिफाइंड को एक साथ गर्म किया जाता है।
इसके बाद इसमें खुशबू के लिए एक परफ्यूम मिलाया जाता है, जिससे देशी घी जैसी खुशबू आती है। इसके साथ ही अब एक और तरल मिलाया जाता है, जिससे इसमें दाना बन जाता है। बस आपका ‘देशी घी’ तैयार है। अब इसे ठंडा करके थैलियों में भर लिया जाता है।
क्या कहते हैं अधिकारी
खाद्य विभाग के अधिकारी डॉ. एनडी शर्मा का कहना है कि खाद्य पदार्थ को बेचने के अलग अलग मानक बने हुए हैं। दो तरल को मिलाकर बेचा जा सकता है लेकिन उसे ‘घी’ नहीं कहा जा सकता। समय-समय पर सैंपल लिए जाते हैं। फेल आने पर कार्रवाई की जाती है। ज्यादातर में जुर्माने का ही प्रावधान है। दिवाली के आसपास और सैंपल लिए जाएंगे।
क्यों खुलेआम बिकता है सामान
सरकारी नियमों के मुताबिक, खाने पीने की चीजों के सैंपल लिए जाते हैं। सबसे पहले तो उसका निष्कर्ष आने में ही महीनों लग जाते हैं। यदि सैंपल फेल भी आ जाता है तो संबंधित दुकानदार के नाम का केस अतिरिक्त उपायुक्त के पास जाता है। यहां भी फाइल घूमती रहती है। इसके बाद साधारण जुर्माने का बाद मामला खत्म हो जाता है।
क्यों खुलेआम बिकता है सामान
सरकारी नियमों के मुताबिक, खाने पीने की चीजों के सैंपल लिए जाते हैं। सबसे पहले तो उसका निष्कर्ष आने में ही महीनों लग जाते हैं। यदि सैंपल फेल भी आ जाता है तो संबंधित दुकानदार के नाम का केस अतिरिक्त उपायुक्त के पास जाता है। यहां भी फाइल घूमती रहती है। इसके बाद साधारण जुर्माने का बाद मामला खत्म हो जाता है।