फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Delhi ›   Delhi NCR News ›   Arvind Kejriwal will take oath as Chief Minister for the third time in seven years

जिद और जोखिम के जादूगर, सात साल में तीसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे अरविंद केजरीवाल

Wed, 12 Feb 2020 05:49 AM IST
दुष्यंत शर्मा शरद गुप्ता, नई दिल्ली
शरद गुप्ता, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Wed, 12 Feb 2020 05:49 AM IST
विज्ञापन
Arvind Kejriwal will take oath as Chief Minister for the third time in seven years
अरविंद केजरीवाल - फोटो : Twitter

उन्होंने व्यवस्था परिवर्तन का बीड़ा उठाया था, लेकिन खुद ही उस व्यवस्था का हिस्सा बन गए। अरविंद केजरीवाल पिछले सात सालों में तीसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने जा रहे हैं। उन्होंने हर बार नई मुश्किलों को परास्त कर बड़ी जीत दर्ज की है।

विज्ञापन


विज्ञापन


पढ़ाई से इंजीनियर और पेशे से नौकरशाह रहे केजरीवाल ने पिछले पांच सालों में दिल्ली में शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, पानी जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय काम किया। मौजूदा मुख्यमंत्रियों में अपनी उपलब्धियों के बल पर चुनाव जीतने वाले ओडिशा के नवीन पटनायक के बाद संभवतः देश के दूसरे सीएम हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन


पहले ही चुनाव में शीला दीक्षित को हराया: उनके करिअर पर एक नजर डालने से जाहिर है वे न सिर्फ जिद्दी हैं जोखिम उठाने से भी नही घबराते। वरना कौन सा राजनीतिज्ञ होगा, जो अपने जीवन का पहला चुनाव ही शीला दीक्षित के खिलाफ लड़ेगा जो 15 साल से न सिर्फ दिल्ली की सत्ता में बतौर मुख्यमंत्री काबिज थीं, बल्कि उसे आधुनिकतम स्वरूप और सुविधाएं प्रदान करने में उनकी महती भूमिका थी। दूसरा चुनाव नरेंद्र मोदी के खिलाफ वाराणसी से लड़ा, जो उस वक्त लोकप्रियता की लहर पर सवार भावी पीएम के तौर पर देखे जा रहे थे।

मंत्रियों पर लगे संगीन आरोप: मंत्रिमंडलीय साथियों पर बलात्कार और फर्जी मार्कशीट तैयार कराने के आरोप लगे। कई साथी जेल गए। लेकिन  केजरीवाल लगातार पार्टी पर अपनी पकड़ मजबूत करते गए। 2015 में जीत के बाद उन्होंने अपनी नजरें पंजाब, उत्तराखंड और हिमाचल जैसे छोटे राज्यों पर गड़ा दीं, लेकिन पंजाब में मिली हार के बाद ही उन्हें बाकी राज्य छोड़कर सिर्फ दिल्ली में ही सिमट जाना पड़ा।

करारी हार, उसके बाद प्रचंड जीत
पहले चुनाव में शीला दीक्षित को हराया। कांग्रेस के साथ गठबंधन कर सरकार बनाई। महज 49 दिनों के बाद इस्तीफा दे लोकसभा चुनाव लड़ा और करारी हार का सामना करना पड़ा। बाद में उन्होंने स्वयं कहा कि वह उनके जीवन का सबसे निराशाजनक दौर था। सभी उन्हें भगोड़ा कहते थे। लेकिन केजरीवाल लगे रहे। एक साल के राष्ट्रपति शासन के बाद हुए विधानसभा चुनाव में जनता का भरोसा जीतने में कामयाब हुए। दिल्ली विधानसभा की 70 सीटों में से 67 जीतकर अभूतपूर्व विजय प्राप्त की।

जहां से रिजेक्ट हुए, वहीं की नौकरी
सीधे-साधे दिखने वाले केजरीवाल में यह जिद और हार न मानने की प्रवृत्ति तब से थी, जब वे आईआईटी खडग़पुर में मेकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे। 1989 में पढ़ाई पूरी होते ही उन्हें देश की सबसे बड़ी पेट्रोलियम कंपनी ओएनजीसी से नौकरी का ऑफर लेटर मिला, लेकिन उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया। वे तो उसी टाटा स्टील में नौकरी करना चाहते थे, जिसने इंटरव्यू में उन्हें रिजेक्ट कर दिया था। दोबारा इंटरव्यू के लिए उन्होंने टाटा स्टील के मुख्यालय में बात की कि उन्हें इंटरव्यू का बस एक और मौका मिल जाए तो वह अपने आप को साबित कर देंगे। आखिरकार कंपनी ने उनका फिर से इंटरव्यू लिया और अंतत: वह टाटा स्टील की नौकरी पाने में सफल रहे। हालांकि जल्द ही वे उससे ऊब गए और छोड़कर उन्होंने सिविल सेवा की परीक्षा दी और राजस्व सेवा में चयन हुआ।

जनलोकपाल आंदोलन

चार वर्ष बाद वह महाराष्ट्र के गांधीवादी समाजसेवी अन्ना हजारे के करीब आए।  उस समय मनमोहन सरकार में सामने आए कई बड़े घोटालों से जनता में नाराजगी थी। भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए अन्ना हजारे के नेतृत्व में जनलोकपाल आंदोलन की नींव डाली। रामलीला मैदान में स्वत: स्फूर्त रूप से देश के कोने-कोने से परिवर्तन की आस में आए हजारों लोगों की भीड़ कई दिन और रात तक जुटी रही। पहली बार हुआ कि सरकार किसी कानून को बनाने के लिए आंदोलनकारियों की मदद लेने को तैयार हुई। लेकिन बात टूट गई। पी चिदंबरम और कपिल सिब्बल जैसे मंत्रियों ने कहा, कानून तो संसद में ही बन सकता है ना कि सड़कों पर। यदि आंदोलनकारियों को कानून बनाना ही है तो पहले उन्हें चुन के विधानसभाओं और संसद में आना होगा।

केजरीवाल ने चुनौती स्वीकारी और नवंबर 2012 में चंद साथियों के साथ आम आदमी पार्टी शुरू की। उनकी पार्टी ने साल भर में ही चमत्कार कर दिखाया। 2013 के विधानसभा चुनाव में 28 सीटों के साथ भाजपा के बाद सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाई, लेकिन जिस वैकल्पिक राजनीति का सपना उन्होंने लोगों को दिखाया था वह आज भी एक सपना ही रह गया है। उनकी आम आदमी पार्टी आज किसी भी दूसरी राजनीतिक पार्टी की तरह ही बन गई है। इस बीच उनके अधिकतर साथी उन पर गैर-लोकतांत्रिक और तानाशाही रवैया अपनाने का आरोप लगाते हुए एक-एक कर उनका साथ छोड़ गए।

यह देखना दिलचस्प होगा क्या वे एक बार फिर दिल्ली के बाहर अपने पैर पसारने की कोशिश करेंगे या फिर दिल्ली पर ही फोकस रख इसे बेहतर गवर्नेंस के जरिए एक आदर्श राज्य के रूप में विकसित करेंगे। और क्या एक बार फिर विवादों से घिरे रहेंगे या उनसे किनारा करेंगे जैसा उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान किया?

समाज सेवा भी

समाज सेवा में रुचि जगी, तो वे मदर टेरेसा से मिले और कोलकाता के कालीघाट आश्रम में दो महीने तक काम किया। बाद में रामकृष्ण मिशन और क्रिश्चियन ब्रदर्स एसोसिएशन से जुड़े। 1995 में वह आईआरएस में चुने गए। इनकम टैक्स डिपार्टमेंट में नौकरी करने लगे। उन्होंने पाया कि  करप्शन खत्म करने और टैक्स चोरों को पकड़ने के लिए बने विभाग में सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार हो रहा है। 1999 में ‘परिवर्तन’ नामक संस्था के जरिए  मुहिम शुरू की। वे पर्चे बांटते और अपील करते कि आयकर विभाग में किसी ने रिश्वत मांगी है तो सूचित करें। उसी वर्ष दिल्ली में राशन घोटाले का खुलासा कर वे सुर्खियों में आ गए। 2006 में इनकम टैक्स के ज्वाइंट कमिश्नर पद से इस्तीफा दे दिया।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed