एंटी सेक्सुअल हरासमेंट नीति में उठी बदलाव की मांग
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सेंट स्टीफंस कॉलेज में पीएचडी कर रही छात्रा के सेक्सुअल हरासमेंट मामले के तूल पकड़ने के बाद डीयू में एंटी सेक्सुअल हरासमेंट पॉलिसी को बदलने की मांग शुरू हो गई है।
यूनिवर्सिटी में जेंडर स्टडीज ग्रुप (जीएसजी) ने इसमें बदलाव करने की मांग की है। समूह का कहना है कि डीयू की मौजूदा पॉलिसी बेहद कमजोर है। इसमें सभी वर्ग की भागीदारी नहीं है।
बताते चलें कि जीएसजी दिल्ली विश्वविद्यालय में जेंडर सेसिटाइजेशन प्रोग्राम चलाती है। डीयू में पढ़ाने वाले शिक्षक इस समूह के मेंटर हैं। सीएसजी इसमें बदलाव को लेकर बीते कुछ समय से डीयू में अभियान भी चला रही है।
बताते चलें कि बीते साल डीयू ने पहले से लागू ऑर्डिनेंस 15डी को खत्म करके सेक्सुअल हरासमेंट ऑफ वूमेन एट वर्कप्लेस एक्ट 2013 लागू किया है। मगर जीएसजी इस एक्ट से सहमत नहीं है।
कमेटी में मिले स्टूडेंट को भागीदारी
उनके मुताबिक, डीयू के कॉलेजों में एंटी सेक्सुअल हरासमेंट कमेटी बनती है उसमें कई विसंगतियां हैं। उसे सिर्फ कॉलेज के स्टाफ और टीचर्स चलाते हैं, जबकि उसमें स्टूडेंट की भी भागीदारी होनी चाहिए।
यही नहीं डीयू की जो मौजूदा पॉलिसी है वह कहती है कि अगर पीड़ित के लगाए गए चार्ज सही साबित नहीं होते हैं तो कार्रवाई उसके ऊपर ही होगी। जांच वहीं करते या उनके साथी जो उसी कॉलेज में शिक्षक हैं।
ऐसे में कई बार लोग खुलकर सामने नहीं आते हैं। एस्ले टेलिस जो सेंट स्टीफंस, किरोड़ीमल कॉलेज और रामजस कॉलेज में पढ़ा चुकी हैं उनके मुताबिक डीयू में पिछले दस साल से लागू पुरानी पॉलिसी आर्डिनेंस 15डी सबसे अच्छा था। इस पॉलिसी में कॉलेज या यूनिवर्सिटी से जुड़े सभी लोगों की भागीदारी थी।