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कोरोना ने दिल्ली एम्स से छीना सबसे बड़ा खिताब, वरना फेफड़ों के प्रत्यारोपण में होता नंबर वन
Wed, 02 Dec 2020 06:24 PM IST
पूजा त्रिपाठी
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
Published by: पूजा त्रिपाठी
Updated Wed, 02 Dec 2020 06:24 PM IST
सार
- एम्स दिल्ली में फेफड़ों का प्रत्यारोपण होना था सबसे पहले
- लाइसेंस मिलने के बाद भी अब तक नहीं शुरू हुई सेवा
- दिल्ली के निजी अस्पताल ने मारी बाजी, पहली बार कर दिया फेफड़ों का प्रत्यारोपण
- एम्स के डॉक्टरों ने कहा- कोरोना आने के बाद सबका ध्यान संक्रमण पर ही
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एम्स दिल्ली
- फोटो : फाइल
विस्तार
देश के सबसे बड़े चिकित्सीय संस्थान से कोरोना वायरस ने एक खिताब छीन लिया। उत्तर भारत में पहली बार फेफड़ों का प्रत्यारोपण करने के लिए दिल्ली एम्स के डॉक्टर लंबे समय से प्रयास कर रहे थे।
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इसे लेकर सभी तैयारियां पूरी करने के बाद संस्थान को राष्ट्रीय अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण संगठन (नोटो) से लाइसेंस भी प्राप्त हो गया, लेकिन कोरोना महामारी के आने से प्रत्यारोपण का काम आगे नहीं बढ़ पाया।जिसके चलते अब पहला प्रत्यारोपण का खिताब एम्स को न मिलकर दिल्ली के ही एक निजी अस्पताल को मिला है जिसने कुछ ही दिन पहले कोरोना संक्रमित मरीज का फेफड़ा प्रत्यारोपण करके जान बचाई है।
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जानकारी के अनुसार अभी तक वर्ष 1994 में पहला हृदय प्रत्यारोपण करने वाले एम्स में फिलहाल लिवर, किडनी और दिल का प्रत्यारोपण होता है। इन अंगों के प्रत्यारोपण में करीब एक लाख रुपये तक खर्च होता है। जबकि कुछ केस में राशि डेढ़ से दो लाख रुपये से भी अधिक पहुंचती हैं।
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हालांकि फेफड़ों का प्रत्यारोपण देश के चुनिंदा अस्पतालों में होता है। निजी अस्पतालों में इसके प्रत्यारोपण की कीमत करीब 50 लाख रुपये तक है। ज्यादात्तर ये प्रत्यारोपण दक्षिणी भारत के राज्यों में किए जाते हैं। चैन्ने के अस्पतालों में यह प्रत्यारोपण ज्यादा किया जाता है।
पिछले वर्ष ही एम्स को फेफड़ा प्रत्यारोपण का लाइसेंस प्राप्त हुआ था। इसके बाद वेंटिग लिस्ट भी तैयार की गई थी। हालांकि खर्चा ज्यादा होने के चलते एम्स संस्थान की ओर से कुछ सामाजिक संगठनों के साथ चर्चा की जा रही थी ताकि शुरुआती मरीजों को मुफ्त में सुविधा दी जा सके।
दो वर्ष पहले पीजीआई चंडीगढ़ में एक मरीज का प्रत्यारोपण हुआ था। एम्स के एक वरिष्ठ डॉक्टर ने बताया कि दिल्ली में एम्स के अलावा गंगाराम और मैक्स अस्पताल के पास भी लाइसेंस है लेकिन वहां अब तक कोई प्रत्यारोपण नहीं हो सका। जबकि मैक्स ने हाल ही में यह प्रत्यारोपण किया है।
डॉक्टरों के अनुसार कोरोना महामारी की वजह से पूरा ध्यान इसी ओर है। मार्च माह में जनता कर्फ्यू और फिर लॉकडाउन घोषित होने के कारण अब तक स्थिति पहले जैसी सामान्य नहीं हो पा रही हैं। ऐसे में लंबित कार्यों को समय पर पूरा कर पाना मुश्किल है। वहीं फेफड़ा प्रत्यारोपण को लेकर एम्स प्रबंधन के शीर्ष अधिकारियों से भी जानकारी लेने का प्रयास किया गया लेकिन जबाव नहीं मिला।