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एआई साहित्य को नई उड़ान दे सकती है, सृजनशीलता का विकल्प नहीं : शेखावत
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- राष्ट्रीय संगोष्ठी में साहित्य और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के संबंधों पर हुआ मंथन
संवाद न्यूज एजेंसी
नई दिल्ली। केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) साहित्य की पहुंच को व्यापक बना सकती है, लेकिन मानवीय सृजनशीलता, कल्पनाशीलता और भावनात्मक गहराई का स्थान नहीं ले सकती। वह साहित्य अकादमी और इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘लेखकविहीन क्षितिज : एआई, सृजनशीलता और उभरता रचनात्मक वातावरण’ के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि डिजिटलीकरण, अनुवाद और तकनीकी माध्यमों से साहित्य को अधिक लोगों तक पहुंचाया जा सकता है। इससे पुस्तकालयों को सशक्त बनाने और युवाओं को साहित्य से जोड़ने के नए अवसर पैदा हुए हैं। हालांकि, मानवीय संवेदनाओं और मौलिक रचनात्मकता का कोई विकल्प नहीं हो सकता।
साहित्य अकादमी के सचिव डॉ. वरुण गुलाटी ने कहा कि तकनीकी विकास ने लेखकों और वक्ताओं की भूमिका को लेकर नए सवाल खड़े किए हैं। वहीं श्याम सरन ने कहा कि एआई चाहे कितनी भी उन्नत हो जाए, वह मानवीय संवेदनाओं और सहानुभूति को पूरी तरह आत्मसात नहीं कर सकती। संगोष्ठी में साहित्यकारों, विद्वानों और तकनीकी विशेषज्ञों ने एआई की संभावनाओं, चुनौतियों और साहित्य पर उसके प्रभाव को लेकर विचार साझा किए।
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संवाद न्यूज एजेंसी
नई दिल्ली। केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) साहित्य की पहुंच को व्यापक बना सकती है, लेकिन मानवीय सृजनशीलता, कल्पनाशीलता और भावनात्मक गहराई का स्थान नहीं ले सकती। वह साहित्य अकादमी और इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘लेखकविहीन क्षितिज : एआई, सृजनशीलता और उभरता रचनात्मक वातावरण’ के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि डिजिटलीकरण, अनुवाद और तकनीकी माध्यमों से साहित्य को अधिक लोगों तक पहुंचाया जा सकता है। इससे पुस्तकालयों को सशक्त बनाने और युवाओं को साहित्य से जोड़ने के नए अवसर पैदा हुए हैं। हालांकि, मानवीय संवेदनाओं और मौलिक रचनात्मकता का कोई विकल्प नहीं हो सकता।
साहित्य अकादमी के सचिव डॉ. वरुण गुलाटी ने कहा कि तकनीकी विकास ने लेखकों और वक्ताओं की भूमिका को लेकर नए सवाल खड़े किए हैं। वहीं श्याम सरन ने कहा कि एआई चाहे कितनी भी उन्नत हो जाए, वह मानवीय संवेदनाओं और सहानुभूति को पूरी तरह आत्मसात नहीं कर सकती। संगोष्ठी में साहित्यकारों, विद्वानों और तकनीकी विशेषज्ञों ने एआई की संभावनाओं, चुनौतियों और साहित्य पर उसके प्रभाव को लेकर विचार साझा किए।
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