शोध: आपके बच्चे की उम्र है 8-12 साल, और उसमें दिखते हैं ये लक्षण, तो हो जाएं सावधान; कहीं ये अपराधी न बन जाएं
डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल के मनोरोग विभाग के प्रोफेसर डॉ. लोकेश शेखावत ने कहा कि आठ से 12 साल की उम्र के बच्चों में बदलाव आता है। इस दौरान बच्चे ज्यादा उग्र रहते हैं। इस समय माता-पिता को विशेष ध्यान देना चाहिए। यदि बच्चे के व्यवहार में कुछ भी बदलाव दिखे तो उसे समझकर सुधार करना चाहिए।
विस्तार
आठ से 12 साल की उम्र में ही बच्चों की हरकतें अपराध के तरफ उनके झुकाव का शुरुआती संकेत दे सकती हैं। यह खुलासा डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल के मनोरोग विभाग के विशेषज्ञों के विश्लेषण से हुआ है।
विशेषज्ञों का कहना है कि समाज के टूटते ताने बाने के बीच अपराध काफी बढ़ गया है। इन अपराधों में आरोपी के तौर पर नाबालिगों की संख्या काफी है, जबकि इन्हें निगरानी के मदद से रोका जा सकता है। यदि बच्चों में आठ साल की उम्र से झगड़ा, खुद की गलती न मानना, छोटी-छोटी बात पर लड़ना, स्कूल से लगातार शिकायत आना, आस पड़ोस के बच्चों से मारपीट करने की शिकायत आती रहे और 12 साल की उम्र तक धीरे-धीरे यह और बढ़ जाए तो सतर्क होने की जरूरत है।
ये समाज और परिवार के लिए समस्याएं खड़ी कर सकते हैं
ऐसे बच्चे तेजी से अपराध की और आकर्षित होते हैं। यह बच्चे न केवल समाज के लिए खतरा बन सकते हैं बल्कि कई बार अपने ही परिवार के लिए समस्याएं खड़ी कर सकते हैं। पिछले एक माह में दिल्ली में ऐसे कई अपराध की घटनाएं सामने आई हैं जिनमें नाबालिग अपराधी पाए गए हैं।
छोटी-छोटी बात पर लड़ना और मार पीट करना गंभीर चिंता
डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल के मनोरोग विभाग के प्रोफेसर डॉ. लोकेश शेखावत ने कहा कि आठ से 12 साल की उम्र के बच्चों में बदलाव आता है। इस दौरान बच्चे ज्यादा उग्र रहते हैं। इस समय माता-पिता को विशेष ध्यान देना चाहिए। यदि बच्चे के व्यवहार में कुछ भी बदलाव दिखे तो उसे समझकर सुधार करना चाहिए। छोटी-छोटी बात पर लड़ना और मार पीट करना उसे अपराधी बनाने की दिशा में पहला कदम हो सकता है। इन बच्चों में गुस्सा कंट्रोल करने की क्षमता नहीं होती। इनमें भावनात्मक जुड़ाव कम हो जाता है। ऐसे में यदि बच्चा नशा भी करता है तो समस्या और गंभीर हो जाती है।
अपने झगड़े में न करें बच्चे का इस्तेमाल
शहरीकरण में तेजी से एकल परिवार का चलन बढ़ा है। इसमें देखा गया है कि पति-पत्नी के बीच हुई लड़ाई में अक्सर खुद को दोनों खुद को बेहतर दिखाने के लिए बच्चे को अपने पक्ष में करने का प्रयास करते हैं। इस दौरान यह पैसे या दूसरे वस्तु का लालच भी देते हैं। इसका फायदा बच्चा उठाता है और पैसे व दूसरे वस्तु की लालच में अपने फायदे के हिसाब से दोनों का पक्ष लेता है। जो आगे चलकर बच्चे को जिद्दी, अधिक गुस्सा करने वाला, मांग पूरी न होने पर हमला करने वाला बना देता है।
नशे की तरह लगता है अपराध का लत
डॉ. शेखावत बताते हैं कि बच्चों का विश्लेषण बताता है कि जिस तरह से नशे की लत होती है। उसी तरह अपरोध की लत भी बच्चों को लग जाती हैं। अपराध करना उन्हें एक थ्रिल देता है। इसे पाने के लिए वह किसी भी हद तक जा सकते हैं। इन्हें किसी का डर भी नहीं रहता है।
- स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की पहचान व उनकी मानसिकता को जानना
- नशा करना (घर में बच्चों के आसपास नशा न करें)
- थ्रिल हासिल करने के लिए किसी को परेशान करने से रोकना
- घर के अंदर भावनात्मक लगाव बढ़ना
- पति-पत्नी या परिवार में झगड़ने न होने देना