350 साल बाद नए स्वरूप में दिखेगा रहीम का मकबरा
- नए रंग-रूप के साथ आम लोगों के लिए खोला गया
- 2014 से चल रहा था सौंदर्यीकरण का काम
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लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर से बना अब्दुर्रहीम खान-ए-खाना का मकबरा लगभग 350 साल बाद अब नए स्वरूप में दिखाई देगा। सदियों से उपेक्षित इस मकबरे को आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) के साथ मिलकर इंटरग्लोब फाउंडेशन व आगा खां ट्रस्ट फॉर कल्चर ने फिर से संरक्षित करने का प्रयास किया है। साल 2014 से इसके सौंदर्यीकरण का काम शुरू हुआ था, जो अब पूरा हो चुका है। सबसे खास इसके चारों ओर लगी रंग-बिरंगी लाइटें हैं। जो रात को इसकी खूबसूरती को और बढ़ाती है। बृहस्पतिवार को मुगल स्थापत्य कला के इस उत्कृष्ट नमूने को नए रूप रंग के साथ आम लोगों के लिए खोल दिया गया।
रहीम का मकबरा मुगल बादशाह हुमायूं के मकबरे और सूफी संत हजरत निजामुद्दीन की दरगाह के नजदीक ग्रैंड ट्रंक रोड पर 16 वीं सदी के अंत में बनवाया गया था। इसे मुगल बादशाह अकबर के नवरत्नों में से एक अब्दुर्रहीम खान-ए-खाना ने अपनी बेगम की याद में बनवाया था। मुगल सल्तनत में यह पहला निर्माण था, जिसे किसी ने अपनी बेगम के प्रेम में बनवाया था। लेकिन 18वीं सदी में इस दो मंजिला खूबसूरत मकबरे से लाल बलुआ पत्थरों की खुदाई का काम शुरू हो गया।
दिल्ली में सफदरजंग के मकबरे के निर्माण के लिए इस मकबरे के खूबसूरत व नक्काशीदार संगमरमर और बलुआ पत्थरों को निकाल लिया गया। तब से यह जगह उजाड़ खंडहर में तब्दील हो गई थी। आगा खां ट्रस्ट फॉर कल्चर के सीईओ रतीश नंदा ने कहा कि केवल 15 रुपये का टिकट लेकर लोग इस मकबरे का दीदार कर सकेंगे।
रहीम के मकबरे की क्या है खासियत
यहां एक स्थायी एग्जीबिशन लगाया गया है। जिसमें 19 चित्रों के माध्यम से इस मकबरे के इतिहास, रहीम की जीवनी प्रस्तुत की गई है। जिसके माध्यम से मकवरे की कारीगरी, मुख्य कक्ष, गुंबद, लोक शास्त्र में रहीम, रहीम का भक्ति काव्य, नीति काव्य, रहीम कलम के सिपाही जैसे विषयों की जानकारी मिलेगी। साथ ही रहीम के उद्दात भाव, रामायण और महाभारत के प्रति गहरे लगाव के विषय में भी जानकारी प्राप्त होगी।