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सत्ता के साथ चुनावी राजनीति का बदलता रेखागणित

Mon, 20 Oct 2014 04:03 PM IST
Updated Mon, 20 Oct 2014 04:03 PM IST
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aap leader yogendra yadav's view on state polls.

हरियाणा और महाराष्ट्र में बीजेपी की जीत बड़ी है, जीत का ढोल भी बड़ा है। इस ढोल की पोल यह कहकर खोली जा सकती है कि महाराष्ट्र में बहुकोणीय मुकाबले के कारण भाजपा की जीत बड़ी लग रही वरना वोट के बंटवारे के हिसाब से देखें तो जीत बड़ी नहीं है। यह भी कह सकते हैं की दोनों राज्यों में लोकसभा चुनाव के परिणामों ने खुद को दोहराया भर है।

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लेकिन नहीं, लेकिन यह कोई छोटी बात नहीं है। एक ऐसे वक्त में जब राज्य ही राजनीति का केंद्र हैं, लोकसभा चुनावों की बढ़त को विधानसभा चुनावों में बनाये रखना अपने आप में महत्वपूर्ण है। गठबंधन टूटने के बावजूद बढ़त बरकरार रही, यह भी रेखांकित किए जाने योग्य है। लेकिन असल सवाल यह नहीं कि बीजेपी की जीत कितनी बड़ी या कांग्रेस की हार कितनी गहरी है। असल सवाल यह है कि हरियाणा और महाराष्ट्र के जनादेश से क्या बदला ?
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जाहिर है चंडीगढ़ और मुंबई में ही नहीं, दिल्ली में भी सत्ता का समीकरण बदलेगा। सिर्फ तात्कालिक रूप से ही नहीं दीर्घकाल में भी चुनावी राजनीति का रेखागणित बदलेगा। राज्यों का चुनावी मानचित्र पुनर्परिभाषित होगा। लेकिन, क्या राज और नीति का रिश्ता बदलेगा? राजनीति का व्याकरण बदलेगा? इस बदलाव से जो नया घट रहा है, वह क्या विकल्प की दिशा में ले जायेगा?
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सत्ता के समीकरण में बदलाव

aap leader yogendra yadav's view on state polls.

तात्कालिक तौर पर शक्ति-संतुलन में बदलाव सुनिश्चित है। यह प्रक्रिया लोकसभा चुनावों के अपनी परिणति पर पहुंचने के चंद महीने पहले शुरु हुई थी। इस बीच सत्ताधारी गठबंधन उपचुनावों की हार के झटकों से उबरते हुए मजबूत हुआ है। गठबंधन के भीतर बीजेपी ने वर्चस्व कायम किया।

गठबंधन में शामिल कोई भी दल चुनाव, संसद या फिर सरकार में बीजेपी की मुखालफत करने का साहस नहीं कर सकता। शिवसेना का कद घटा है। हजकां खत्म हुई है। भाजपा ने एनडीए की बैसाखियों को छोड़कर राष्ट्रीय फैलाव की तैयारी शुरू की। एनडीए के अन्दर बीजेपी सब कुछ होती जा रही है। बीजेपी के अन्दर नरेंद्र मोदी-अमित शाह का ही जोर चलेगा।

उम्मीद करनी चाहिए की इस सत्ता समीकरण में बदलाव के शुभ फलितार्थ भी हासिल होंगे। बढते प्रभाव के बूते सरकार कुछ दीर्घकालिक महत्व के फैसले ले सकेगी। बीजेपी दिल्ली में चुनाव कराने का साहस दिखाती है या दिल्ली के राजनीतिक मैदान को बाज़ार बनाती है- यह आने वाला वक्त बताएगा।

हरियाणा में बीजेपी की जीत एक स्थायी सरकार की ओर ले जा रही है जिससे लोगों में उम्मीदें जगना लाज़मी है लेकिन जब हम भाजपा के घोषणापत्र पर नज़र डालते हैं तो उनकी नीयत और गंभीरता पर शंका होती है। लोकसभा चुनावों में भाजपा कारपोरेट खेती को बढ़ावा देने की बात करती है तो हरियाणा विधान सभा चुनावों में ठीक इसके उलट वादा कर देती है।

घोषणापत्र में वादा होता है कि फसलों के लागत मूल्य पर किसानों को 50% का फायदा पंहुचाया जाएगा लेकिन फैसले एकदम उलट लिए जाते हैं। शासन की ऐसी विरोधाभासी प्रवृति के साथ भाजपा जनता के साथ कितना न्याय करेगी यह देखने वाली बात होगी। उधर कांग्रेस में बेताल फिर से अपनी डाल पर जा बैठा है, उपचुनावों से जो भी थोड़ी बहुत राहत मिली थी वह क्षणभंगुर साबित हुई। गांधी परिवार के नेतृत्व पर फिर से सवालिया निशान लगेंगे।

चुनावी राजनीति का बदलता रेखागणित

aap leader yogendra yadav's view on state polls.

तात्कालिक बदलावों के चक्कर में यह ना भूल जायें कि इन चुनाव परिणामों के कुछ दूरगामी असर भी होने वाले हैं। इन दोनों राज्यों में राजनीतिक मुकाबले का स्वरुप बहुत गहराई तक बदल सकता है। हरियाणा में मामला त्रिकोणीय जान पड़ता है लेकिन क्या आगे चलकर हरियाणा में कांग्रेस और आईएनएलडी के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा होगा?

आईएनएलडी परिवार जेल में है और इस लिहाज से वह प्रदेश में बीजेपी की दयादृष्टि पर आश्रित होगा। कांग्रेस अपना सामाजिक आधार खो रही है और उसे अपने को विपक्ष के रुप में बचाये रखना मुश्किल होगा।

महाराष्ट्र में मामला बहुकोणीय जान पड़ता है लेकिन बीजेपी ने दांव चतुराई से खेला तो शिवसेना की चुनौती वहां कम हो सकती है। एनसीपी सफल रही, उसने कांग्रेस को उसकी हैसियत बताने की सोची थी और बता दिया। वह क्षेत्रीय पार्टी के रुप में रहेगी। कांग्रेस को महाराष्ट्र में अब सिमटते जाना है।

इसका संबंध राजनीतिक पर पड़ने वाले दूरगामी असर से है। राजनीतिक शून्य बढ़ रहा है, दमदार और असरदार विपक्ष गायब हो चला है। गुजरात से लेकर ओड़ीशा तक मध्यवर्ती भारत में बीते 15 सालों में विपक्ष अपने को शक्ल देने में नाकाम रहा है। बीजेपी बनाम अन्य के मुकाबले वाले राज्यों की तादाद बढ़ रही है। बिहार, यूपी के बाद अब हरियाणा और महाराष्ट्र इसी रास्ते पर हैं। अगर भाजपा बनाम बाकी सब का समीकरण बना तो भाजपा को जीत और हार दोनों में फायदा होगा।

राजनीति का पुराना व्याकरण

aap leader yogendra yadav's view on state polls.

राजनीति में फिलहाल सार्थक विकल्प नहीं है। बीजेपी अपनी सफलता के साथ लगातार कांग्रेस की तरह होती जा रही है। हरियाणा में थोक भाव से बीजेपी ने कांग्रेस के नेताओं का आयात किया। नरेन्द्र मोदी कांग्रेस मुक्त भारत की बात तो करते हैं लेकिन क्या उन्हें पता है कि बीते कुछ समय से वे भाजपा का ही का कांग्रेसीकरण करते जा रहे हैं।

जाति-समुदाय का गणित जारी है। चुनावी मुद्दे ठहराव के शिकार हैं, इस मोर्चे पर कुछ भी महत्वपूर्ण घटित नहीं हो रहा। नेता का कद, पार्टी के कद से बड़ा हुआ है। धनबल, बाहुबल और मीडिया-बल का उपयोग बदस्तूर जारी है, पुराने चेहरे पुराने फार्मूले, मुद्दों पर पहले की सी वही हवाबाजी जारी है। डेरा से किया गया भाजपा का 'सच्चा सौदा' भी किसी वैकल्पिक राजनीति की नीव नहीं रखता।

इसलिए, राजनीति का संकट आज पहले से कहीं ज्यादा गहरा है। विकल्पहीनता की हालत में वोटर कम से कम शासक के तौर पर पार्टी पलटता है, उसी में कुछ नयापन खोजता है। लेकिन हकीकत है की नया शासन फिर से उसी विकल्पहीनता को गहरा करता है। राजनीति में शून्य बड़ा होता जाता है। इस राजनीतिक शून्य से वैकल्पिक राजनीति की राह निकल सकती है।

('आप' के वरिष्ठ नेता योगेंद्र यादव के फेसबुक वॉल से साभार)

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